My Political Ideology

भारत विभिन्न जातियों, धर्मों एवं चेतनाओं का क्षेत्र है. यह देश केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं बंटा अपितु भाषा, धर्म, सामाजिक आधार पर भी बंटा है. इस बंटवारे का फायदा अक्सर राजनैतिक व्यक्ति उठाने का प्रयास करते हैं. वे किसी वर्ग को यह बताने का प्रयास करते हैं कि वह वर्ग दूसरे वर्गों से किसी प्रकार अलग है अथवा उस वर्ग की कथित रूप से सहायता कर अपने आप को उस वर्ग का हितैषी बताने का अथवा बनाने का प्रयास करता है. सामाजिक बंटवारे का यह प्रमुख कारण है. यह स्थिति कमोबेश जब से यह विश्व बना है तब से चल रही है. इस स्थिति को और वीभत्स बनाने के लिए धार्मिक अन्धविश्वास और पाखंड का सहारा लिया गया. मानसिक रूप से कमजोर लोगों के लिए यह स्थिति बहुत खतरनाक थी क्योंकि वे उस वर्ग अथवा उस विचार के संरक्ष्ण में लग गये जो उन्हें दिया गया था. राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में, “धर्म अथवा मजहब का असली रूप क्या है? मनुष्य जाति के शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या विश्वासों का समूह ही धर्म है. यदि उसमें और भी कुछ है तो वह है पुरोहितों, सत्ता धारियों और शोषक वर्गों के धोखे फरेब, जिससे वे अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से बाहर नहीं जाने देना चाहते.” समाज को पहले बड़े वर्गों में बांटा जाता है जिन्हें हम खुश होकर धर्म कहते हैं; फिर उसे छोटे वर्गों में बांटा जाता है जिन्हें हम जाति, समुदाय आदि कहते हैं. बाँट कर उन्हें दूसरे वर्गों से नफरत करना अथवा उनका शोषण करना सिखाया जाता है; यह स्थिति लगातार चलती रहती है. हम इसे भारत के सन्दर्भ में तौलें तो हम देखेंगे कि समय समय पर भारत को भी अलग अलग प्रकार से बांटा गया है. कभी सुर असुर, कभी आर्य एवं अनार्य तो कभी द्रविड़ और गैर द्रविड़ में! सहूलियत के अनुसार उन्हें एक दूसरों से लड़ना सिखाया गया. इन वर्गों को भी अलग अलग वर्गों में बांट दिया गया. कहीं जातियां बनीं तो जहाँ जातियां नहीं थी वहां समुदाय बन गये. जहाँ एक जाति में लोग एकसाथ आना शुरू हुए वहां पर उन जातियों में भी अंदर वर्गीकरण कर दिया गया. इस वर्गीकरण ने समाज को आज खोखला बना दिया है. यह स्थिति आज के समय में सबसे बड़ा चैलेंज है. रीतिरिवाज, छुआछूत जैसी समस्याएँ जो भारत में मूल रूप से शामिल हैं वह भारत से बाहर एक आश्चर्य के रूप में देखी जाती है; खासकर कि विकसित देशों में. हमारी स्थिति अति वीभत्स इस कारण भी है कि जहाँ एक ओर तो हमने सिद्धांतों के अनुसार अधिक उदार एवं सहिष्णु होने का दावा किया वहीँ पर हमारे सामाजिक आचार और अधिक संकीर्ण होते गये. यह फटा हुआ व्यक्तित्व, सिद्धांत और आचरण का यह विरोध आज भी हमारे साथ है और आज भी हम उसके विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं. पूर्वजों के कथित ज्ञान को जिस प्रकार हम दूर कर अशुद्ध आचरण करते हैं वह हमारे दोहरे व्यक्तित्व का परिचायक है. इस दोहरे व्यक्तित्व को समाज के कथित उच्च वर्ग के द्वारा अग्नि दी जाती है जिससे समाज में और अधिक बंटवारा होता है. इस प्रकार हम एक ऐसे समाज में जन्म लेते हैं जहाँ से बाहर आना न तो सम्भव ही हो पाता है और यदि हम बाहर निकलने का प्रयास करते हैं तो हमें पता लगता है कि हमें विद्रोही समझ लिया जाता है और विद्रोही समझ समाज न केवल हमारे विचारों की हत्या करता है अपितु कभी कभी व्यक्ति को समाप्त करने की परिणति भी आ जाती है. मानसिक रूप से हमारी स्थिति कितनी भयावय है इसे हम अप्टन सिंक्लेयर के शब्दों में समझते हैं ; वे एक जगह कहते हैं कि, “ मनुष्य को बस आत्मा की अमरता के बारे में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसका सब कुछ लूट लो; वह बगैर बड़बडाए इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा.” समाज के कमरे वर्ग (वह वर्ग जो भुजबल से कार्य कर अपनी रोजी रोटी चलाता है) को तरह तरह के डर दिखा कर दिशाहीन करने का प्रयास विश्व में हर एक समाज में होता आया है. इस कार्य के रूप अलग अलग हो सकते हैं पर वह होता अवश्य है.  भारतीय समाज की एक खासियत रही है और वह है दोगलापन! बगल में छुरी और मूंह में राम राम यह भारतीय समाज की एक ऐसी खासियत है जिसका मेल शायद ही विश्व में कहीं और दिखे. “ग्राहक ही भगवान् है” ऐसा अपनी दुकानों के आगे लिख ये दुकानदार किस प्रकार अपने भगवान् को लूटते हैं और फिर बाद में दीपावली के समय किस प्रकार अपने भगवान् की छिप कर पूजा करते हैं और किस प्रकार बड़े बड़े मंदिरों में लाखों करोड़ों का दान देते हैं ताकि उनके ये पाप छिप सकें; यह बात किसी से छिपी नहीं है. हम ऊपर से नैतिकता का ढोंग करते हैं और अन्दर हमारी एक अलग ही दुनिया रहती है यह हम सब जानते हैं. नारी को एक तरफ देवी मान पूजने वाला भारतीय पुरुष किस प्रकार नारी का निरादर सदियों से करता आया है यह किसी से छिपा नहीं है. मुझे इस प्रकार की दोहरी नैतिकता से बड़ा जबरदस्त गुस्सा है. मनसा वाचा एवं कर्मणा तीनों का एक साथ होना शायद ही किसी भारतीय पुरुष में हमें दिखे. इसे सत्य में ही नैतिक पतन कहा जा सकता है और इसकी कोई सीमा नहीं. समाज के उद्धार का रास्ता स्वतंत्र विचारधारा से होकर जाता है. शहीद भगत सिंह एक जगह लिखते हैं, “आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं. क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था. अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जायेगा.”

ऐसे में मेरी राजनीति कैसे होगी?

ऐसी स्थिति में मुझे स्वयम की वर्ग चेतना से ऊपर उठ कार्य करना होगा. इसे हम वर्ग मुक्ति का नाम दे सकते हैं. वर्ग मुक्ति का अर्थ यह नहीं कि हम वर्ग के प्रति उदासीन हो जाएँ जैसे कम्युनिस्ट हो जाते हैं. वर्ग मुक्ति का अर्थ यह है कि हम यह भूल कर कार्य करें कि फलां मनुष्य फलां वर्ग का है. इसका सीधे शब्दों में मानें तो यह अर्थ है कि व्यक्ति अपनी जाति और अपनी श्रेणी की प्राथमिकताओं को छोड़ समाज के विभिन्न वर्गों की समग्र स्थिति को सुधारने का प्रयास करे. लेकिन इसमें ध्यान रहे कि किसी वर्ग विशेष का अहित न हो; लेकिन समाज का हित अवश्य हो. इसे सरल भाषा में समझें तो मैं जिस समुदाय से सम्बन्ध रखता हूँ तो मैं जो कार्य करूँ वे समग्र समाज के हित में हो लेकिन उससे मेरे समुदाय का अहित भी न हो. इसे आदर्श स्थिति में राजनीति कहा जा सकता है. हाँ एक वर्गीकरण करना समाज के हित में अवश्य है. समाज के अंदर व्यापक असमानता के कारण एक वर्ग ऐसा अवश्य है जो दबा कुचला रहगया है. वह है कमेरा वर्ग जिसमें किसान, मजदूर और दलित आते हैं. ये वे लोग हैं जो भुजबल से कार्य कर रोजी रोटी का संकलन करते हैं. असमान योजनाओं का सबसे बड़ा खामियाजा उस वर्ग को उठाना पड़ा है. मेरा प्रयास इस ही वर्ग के लिए कार्य करने का है. संकीर्ण वर्गों की राजनीति से उभारना और समाज की असल चेतना को उजागर करना मेरा कर्तव्य है. जैसा कि मैंने बताया कि वर्ग मुक्त होने की पहली शर्त यह है कि धर्म और सम्प्रदाय को मैं अपना निजी मामला बना ही न सकूं. हमें यह कार्य इस प्रकार करना होगा कि सभी वर्गों का भला हो और वृहद रूप से कमेरे वर्ग को दबी कुचली स्थिति से उभार कर मुख्य धारा में लाया जा सके. धर्म, जाति आदि कार्य करने का अथवा दूरी बनाने का कोई कारण हो ही नहीं सकता. राजनीति के अंदर मेरा कार्य एवं ध्येय केवल मात्र कमेरे के लिए कार्य करना है. भारत गाँवों में बस्ता है और इन गाँवों से और ग्रामीण वर्ग से मुझे घनिष्ठ प्रेम एवं लगाव है. यही लगाव मेरा राजनीति में आने का कारण है और इसके लिए कार्य करना मेरा उद्देश्य है. इस समय धर्म के अलावा जातिवादी राजनीति भी देश में जहर घोल रही है. मेरा अखंड विश्वास है कि कमेरों की कोई जाति नहीं होती. चूंकि मेरा संघर्ष कमेरों के लिए है अतः स्वयम को मैं किसी भी जातिवादी प्रकार की राजनीति से दूर रखता हूँ. सभी वर्गों का समुचित प्रतिनिधित्व एवं सभी का एक समान विकास ही मेरा ध्येय है. राजनैतिक रूप से मैं स्वयम को दीनबंधु सर छोटू राम, मेरे दादा चौधरी दल सिंह, जननायक चौधरी देवी लाल, चौधरी चरण सिंह, लोकनायक जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर के करीब पाता हूँ. मैं सम्पूर्ण धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखता हूँ. मेरा मानना है कि राज्य एवं राजनैतिक दलों को किसी भी प्रकार स्वयम को धर्म एवं कर्मकांडों से दूर रखना चाहिए. भारत के संविधान के अनुसार भी यह आवश्यक है. अतः मैं स्वयम को किसी भी धार्मिक आयोजन से दूर रखता हूँ. धर्म के मामले पर मैं पूर्ण रूप से निष्पक्ष हूँ. विकास के मामले में मेरा मानना है कि सबसे पहले इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास आवश्यक है; इसके बाद ही अन्य विकास की सम्भावना बनती है. भारत जहाँ एक और अभी तक रोटी, कपडा और मकान की मूल भूत समस्याओं से जूझ रहा है; बहुतेरे ग्रामीण इलाके में आज भी बिजली और पानी नहीं है; वहां इस प्रकार की समस्याओं का हल किये बिना उद्योग आदि का होना अथवा न होना बेमानी है.