नोटबंदी कोई सीक्रेट नहीं था, बड़ी बड़ी कम्पनियों के मालिकों को पहले से पता था

आज सुबह एक मजेदार आर्टिकल पढने को मिला. सोचा आप सब से सांझा कर लूं. नोटबंदी अर्थात विमुद्रीकरण को मोदी सरकार सबसे बड़ा सीक्रेट बता कर प्रचारित कर रही है. पर क्या यह सीक्रेट थी? आइये इसे सीधे सरकार के नजरिये से समझते हैं.

8 नवम्बर को सरकार ने नोटबंदी की घोषणा की. इसका ऐलान खुद प्रधानमन्त्री ने राष्ट्र को सम्बोधित कर किया. हालांकि कुछ पत्रकारों का यहाँ तक कहना है कि यह सम्बोधन पहले से रिकार्डेड था. यह दावा दूरदर्शन के पत्रकार सत्येन्द्र दूबे ने बाकायदा प्रेस कोंफ्रेंस में किया. खैर इस डिटेल में नहीं जाते. आइये नोटिफिकेशन को पढ़ते हैं. नोटिफिकेशन वित्त मंत्रालय की वेबसाईट पर यहाँ है. इस नोटिफिकेशन की शुरुआत निम्न शब्दों से होती है:

“Whereas, the Central Board of Directors of the Reserve Bank of India (hereinafter referred to as the Board) has recommended that bank notes of denominations of the existing series of the value of five hundred rupees and one thousand rupees (hereinafter referred to as specified bank notes) shall be ceased to be legal tender;…”

इसके बोल्ड शब्दों को पढ़ें, ‘Central Board of Directors of the Reserve Bank of India’. यानी इस बोर्ड ने विमुद्रीकरण का निर्णय लिया. चलिए अब आगे बढ़ते हैं. नोटिफिकेशन आगे कहती है कि केंद्र सरकार बोर्ड की सेक्शन 26(2) के तहत हुई रिकमेन्डेशन पर कार्य कर रही है. सेक्शन 26(1) भारतीय रिजर्व बैंक को किसी भी मुद्रा के विमुद्रीकरण का अधिकार देता है. उसके बाद केंद्र सरकार के पास उस रिकमेन्डेशन पर कार्य करने का अधिकार है. केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन के अनुसार इस प्रक्रिया का पालन किया है. इस बोर्ड का गठन Reserve Bank of India Act, 1934 (‘RBI Act’) के सेक्शन 8 के तहत हुआ है. एक्ट को आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

इस केन्द्रीय बोर्ड में 21 सदस्य होते हैं उन सदस्यों में से कम से कम 4 निजी सेक्टर से होने चाहिए. (एक्ट के सेक्शन 8,9 व 10 को पढ़ें). अब ज़रा इस लिस्ट को देख लें और ढूंढें इस लिस्ट में कौन कौन निजी क्षेत्र के व्यापारी हैं. इस लिस्ट के अनुसार निम्न व्यापारी इस बोर्ड में शामिल हैं:

पहले सदस्य हैं डाक्टर नचिकेता मोर

Nachiket M. Mor No Secret: Private businessmen from the corporate world were part of demonitisation decision-making!

डॉक्टर नचिकेत मोर

डाक्टर मोर की बायोग्राफी में RBI की वेबसाइट पर लिखा है:

“He worked with ICICI from 1987 to 2007 and was a member of its Board of Directors from 2001 to 2007. From 2007 to 2011, he served as the founding President of ICICI Foundation and during this period was also the Chair of the Governing Council of IFMR Trust and Board Chair of FINO. He is now the Board Chair of CARE India and, … In the past he has also served as a Board Member of Wipro for five years and Board Chair of the  for two years.”

मतलब डाक्टर मोर आईसीआईसीआई के साथ काम कर चुके हैं और IFMR ट्रस्ट, FINO के बोर्ड पर रहे हैं. इस समय वे Care India और Fixed Income Money Market and Derivatives Association of India के बोर्ड पर हैं. उनके बारे में और जानकारी आप इन्टरनेट से ढूंढिए. आपको पता चलेगा कि वे बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के राष्ट्र के डायरेक्टर हैं.  और

केन्द्रीय बोर्ड के अलगे निजी डायरेक्टर हैं नटराजन चन्द्रसेकरण

Natarajan Chandrasekaran No Secret: Private businessmen from the corporate world were part of demonitisation decision-making!

नटराजन चन्द्रसेकरण

उनका निजी कनेक्शन निम्न रूप में बताया गया है:

“Shri Natarajan Chandrasekaran has been serving as the CEO and MD of Tata Consultancy Services (TCS). .. Shri Chandrasekaran has over 28 years of experience in global software industry and business operations. He served as the Chairman of NASSCOM, and was the Chairperson of the IT Industry at the World Economic Forum, Davos for 2015-16. He is a member of Indo – US CEO Forum as well as India’s bilateral business taskforces for Australia, UK and Japan. ..”

तो श्री चन्द्रशेकरण TCS के CEO हैं. यह वेबसाईट पर भी लिखा हुआ है.

अगले निजी सदस्य हैं श्री भरत नरोत्तम दोषी

Bharat Narottam Doshi No Secret: Private businessmen from the corporate world were part of demonitisation decision-making!

भरत नरोत्तम दोषी

उनका निजी कनेक्शन पढ़ें:
“Shri Doshi is a former Executive Director and Group CFO of Mahindra & Mahindra Limited. He was also the Chairman of Mahindra & Mahindra Financial Services Limited since April 2008…

He is the Chairman of Mahindra Intertrade Limited.

He is also an Independent Director of Godrej Consumer Products Limited.

Shri Doshi is also on the Governing Board of The Mahindra United World College of India, K.C. Mahindra Education Trust and Mahindra Foundation….

Over the last 35 years, Shri Doshi has been actively involved with the work of chambers of commerce and industry being a member of various expert committees. He served as the President of Bombay Chamber of Commerce and Industry for the year 2009-10.”

तो श्री दोषी महिंद्रा कम्पनी से जुड़े हैं. अब थोडा और आगे चलते हैं. Reserve Bank of India General Regulations, 1949 के अनुसार केन्द्रीय बोर्ड किसी भी कार्य के लिए कम से कम हर डायरेक्टर को एक महीने का नोटिस देगा और यदि कोई इमरजेंसी मीटिंग भी बुलाई जाती है तो भी उस मीटिंग का अजेंडा साफ़ तौर पर हर एक डायरेक्टर को बताना जरूरी है. इस रेगुलेशन को आगे पढोगे तो पता लगेगा कि बोर्ड के सभी निजी डायरेक्टरों को भी इस मीटिंग के लिए सूचित रखा जाएगा. अब बताइए कि क्या यह सूचना सच में सीक्रेट थी? स्पष्ट है केंद्र सरकार झूठ बोल रही है और राजद्रोह कर रही है.

यदि केंद्र सरकार इन लोगों के कहे पर कार्य कर ही रही है तो क्या यह आवश्यक है कि इन बेन्कर्स के पास किसी प्रकार का आतंकवाद की फंडिंग को रोकने का कोई तजुर्बा है. इससे पहले नोटबंदी 1978 में की गयी थी. उस समय बाकायदा एक कानून पास कर ऐसा किया गया था. उस कानून को आप यहाँ पढ़ सकते हैं. पहले  ‘The High Denomination Bank Notes (Demonetisation) Ordinance, 1978 (1 of 1978 )’ लाया गया और उसके बाद  ‘The High Denomination Bank Notes (Demonetisation) Act, 1978 लाया गया .

एक और मजेदार बात है; 1978 के अनुसार सेक्शन 26 में RBI की पॉवर से इसे दूर रखा गया था. यानी किसी भी डायरेक्टर को पहले से नहीं पता था. लेकिन इस बार बाकायदा RBI के केन्द्रीय बोर्ड ने बैठक कर यह फैंसला लिया, उसे केंद्र सरकार के पास भेजा; केंद्र सरकार ने उसे भारत पर थोप दिया और अब राजनीति शुरू है.

न संसद को संज्ञान में लिया गया है और न ही केन्द्रीय केबिनेट ने कोई ऑर्डिनेंस ही जारी किया है. तो क्या एक RBI की नोटिफिकेशन को भारत के 127 करोड़ लोगों को पंक्ति में खड़ा करने के लिए पर्याप्त मान लिया गया है. अब प्रधानमन्त्री संसद से बच रहे हैं. वे जानते हैं पटल पर सच बोलना होगा;झूठ बोल कर वे स्वयम को फंसा लेंगे. बाहर वे कुछ भी बोल सकते हैं.

यही कारण है सरकार बार बार मुद्दे से भटका रही है. कोई हैरानी नहीं है कि सितम्बर और अक्टूबर 2016 में लगभग 4,50,000 करोड़ बैंकों में जमा कराये गये और बाद में वहां से दो लाख करोड़ को बाहर निकाल लिया गया. व्यापारियों को पता था और वे अपना कार्य साध चुके थे.

दूसरी तरह से भी सोचा जाये तो क्यों कोई आम आदमी अथवा कमेरा इस बोर्ड में नहीं जो इतने बड़े निर्णय लेने में सफल हुआ है. क्या देश की सरकारों के लिए कमेरे और किसान कोई मायने नहीं रखते हैं?

एक कमेरा वकील

रविन्द्र सिंह ढुल

Reference: CSLRA

के. वी. धनञ्जय जी का आँखें खोलने के लिए धन्यवाद!