किसान का धर्म

Indian Farmer

“हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, हर तन को कपड़ा, हर सर को मकान, हर पेट को रोटी, बाकि बात खोटी” जननायक चौधरी देवी लाल जी के ये अमर वाक्य भारत में राजधर्म की असली मिसाल और पहचान है. आजादी के बाद भारत ने स्वयम को धर्मनिरपेक्ष, पंथनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित किया. इसके बहुत से कारणों में से एक ये भी था कि इस राष्ट्र के बहुलता भरे वर्ग धार्मिक होने की बावजूद एक जैसी समस्याओं से जूझ रहे थे. भारत का लगभग 78% वर्ग जो ग्रामीण क्षेत्र में रहता है और इतनी ही अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है. किसान कोई भी हों उनकी जरूरतें एक समान हैं और उनकी समस्याएं एक समान ही हैं. मैं पहले भी लिखता रहा हूँ कि इन एक जैसी समस्याओं के हल भी कहीं न कहीं एक जैसे ही रहेंगे. इन हलों में सबसे महत्त्वपूर्ण हल ये है कि किसान को कर्मठ एवं आधुनिक बनाने पर कार्य किया जाए न कि उसे धार्मिक बनाने पर. धर्म वर्गीकरण करता है, ठीक ऐसे ही वर्गीकरण जाति व्यवस्था करती है. भले वर्गीकरण हो जाता हो पर दोनों वर्गों की समस्याओं में कोई भी फर्क नहीं है. इसलिए किसान चिंतकों और नेताओं की सबसे बड़ी समस्या और सबसे बड़ा कार्य इस वर्ग को वर्गीकरण से मुक्त कर एक रखने की रही है. महाराजा सूरजमल जो हमेशा स्वयम को एक किसान के रूप में सम्बोधित करते थे, उनकी सेनाओं में सभी जातियों के योद्धा लड़ते थे, ऐसे ही दीन बन्धु सर छोटू राम ने 20वीं सदी के दूसरे एवं तीसरे दशक में किसान एकता के लिए कार्य किया. वे किसानों को धर्मों और जातियों से बाहर रहकर प्रेम करते थे एवं उनके लिए कार्य करते थे. उनके धार्मिक विचारों के बारे में जानने के लिए मैं “भारत में मजहब” नामक उनके एक लेख तक जा पंहुचा जो उनकी पत्रिका बेचारा किसान में छपा था. उसके एक पैरा में वे अपने को धार्मिक बताते हुए कहते हैं:

 “आपने मुझसे हिन्दू धर्म की व्याख्या चाही. मैं खुद वैदिक धर्म का अनुयायी हूँ. हिन्दू हूँ, इसलिए आपने सोचा कि मैं हिन्दू धर्म का निचोड़ बता सकता हूँ. मुझे डर है कि मैं आपकी आशा पूरी करने में असमर्थ हूँ. मैं हिन्दू धर्म को गंगा के पानी की तरह कूजे में बंद नहीं कर सकता हूँ. हिन्दू धर्म न ही एक मत है न ही इसाई, यहूदी और इस्लाम की भांति खालिस मजहब है. यह अनेकों मतों का भंडार है. वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों, गीतों, पुराणों, अनेक मत-मतान्तरों, रामायण, महाभारत की कथाओं, संतों की वाणियों का समुद्र है. अनेक युग आये, अनेक युग गये. हमलावर आये और गये. अनेकों झकोले लगे, अनेक आँदोलन हुए. परन्तु हिन्दू धर्म सबको हजम करता रहा. इसलिए हिन्दू धर्म उदार है, विशाल है, व्यापक है, सहिष्णु है, सहनशील है, अहिंसक है. अस्पृश्यता का कलंक व जहर न हो तो शुद्ध गंगा जल है. सुधारक आये. आते रहेंगे/ समय और स्थान के अनुसार, जमाने की चाल व् मांग के अनुसार हिन्दू धर्म अपने को ढालता रहेगा. 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज सावधान हैं. किसी के मजहब में कोई दखल नहीं देते, हाँ, मजहबी भेदों को मजहबी दंगों तक पंहुचाने में माहिर हैं. भारत के उत्थान, कल्याण के लिए हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकता जरूरी है. मैं इसी काम में जुटा हुआ हूँ. मजहब को अपनी यूनियनिस्ट राजनीति से अलग रखता हूँ. पंजाब के किसानों को सूदखोरों से मुक्ति दिलाने के लिए उनको एकजुट करता हूँ. चूंकि किसान सब मजहबों में हैं और कृषि धंधे के कारण एक प्लेटफोर्म पर जमा हो रहे हैं. यह किसान एकता फिरकापस्ती को भी लगाम देगी. ……………कोई भी मजहब आपस में बैर करना नहीं सिखाता है. सब एक दूसरे के मजहब का समान आदर करेंगे. सब ऋषियों, पैगम्बरों, गुरुओं, संतों और पीरों का आदर करेंगे.”

इस ही किसान एकता के ऊपर बल देते हुए चौधरी साब आगे कहते हैं:

“इस सिलसिले में एक और बात लिख दूं. हिन्दू धर्म के लचीलेपन और समय एवं स्थान के अनुसार अपने आपको ढालने के गुण जो इसे भूतकाल से बचाते रहे, अब फिर आगे आने लगे हैं. वर्तमान स्थिति को सावधानी से समझा जा रहा है. खतरा महसूस किया है. “शुद्धि” को अपनाया है. अस्पृश्यता हटाने लगे हैं. जो इसाई, मुसलमान फिर हिन्दू बनना चाहें, उनका स्वागत होने लगा है. जैसे शंकराचार्य ने बौद्धों को फिर से हिन्दू बनाया था, वैसे ही हिन्दू अब अपने मुसलमान व इसाई बंधुओं को गले मिलाने में लगे हैं. यदि हिन्दू न भी बनें तो कम से कम हिन्दुओं से घृणा तो न करें. मजहब बदला है, देश तो वही है, खून तो वही है. जाटों को ही ले लीजिये. कोई जाट मुसलमान हो गया, कोई सिख बन गया, कोई नास्तिक हो गया, कोई गरीबदासी हो गया, मगर रहा तो जाट ही, खून तो वही रहा. वैसे जाट सब मजहबों, मत-मतान्तरों, राष्ट्रों और वर्गों में पाए जाते हैं. जाट एकता में हिन्दू-मुस्लिम-इसाई सर्वधर्म एकता देखता हूँ. फिरकापस्ती का इलाज जाट एकता से शुरू किया और अब किसान एकता से दे रहा हूँ…”

आजादी के बाद बीसवीं सदी के आखिरी तीन दशकों तक जननायक चौधरी देवी लाल और चौधरी चरण सिंह स्वयम को किसान कहते रहे और किसान एकता की बात करते रहे. जननायक कर्पूरी ठाकुर, बलदेव राज मिर्धा, कुम्भा राम आर्य, चन्द्रशेखर जैसे अनेक नेता हुए जिन्होंने किसान एकता पर लगातार बल दिया. किसानों को वर्गीकरण से मुक्त रख उन्हें किसान बनने की एवं किसान के रूप में ही कार्य करने की प्रेरणा किसी भी राजनैतिक दल का प्रथम कार्य होना चाहिए; लेकिन आजकल कार्य इसका काफी हद तक विपरीत हो रहा है. राजनैतिक दलों के इस व्यवहार से त्रस्त भारत की प्रसिद्ध बोट क्लब की रैली में जननायक चौधरी देवी लाल जी ने इस समस्या को समझते हुए कहा, ” देश की 80% आबादी गाँवों में बसती है. यही आबादी देश की तरक्की व खुशहाली का काम अपने कन्धों पर सम्भालती है. लेकिन इस आबादी की भलाई के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये. अनाज पैदा करने की जरूरत हुई तो किसान के बेटे को आवाज लगाई गयी लेकिन जब साधनों के इस्तेमाल का वक्त आया तो शहरों में रहने वाले 20% लोगों के लिए 80% साधन और 80% गाँव वालों के लिए केवल 20% ही खर्च किया गया.” वे आगे कहे हैं, “यह पहला मौका नहीं है कि गाँव और गरीब की आवाज को दबाने की कोशिश की गयी. आजादी हासिल करने से पहले भी पंजाब में फजल हुसैन, सिकन्दर हयात और सर छोटू राम जैसे जेताओं ने धर्म और जाति से उठ कर एक ऐसी पार्टी बनाई थी जो किसना की भलाई की बात करे. उस पार्टी ने अपने वक्त में कुछ ऐसे कानून बनाए, जिससे कि शहर के आदमी गाँव की जमीन न खरीद सकें, कर्ज के लिए किसी किसान के हल बैल न बिक सकें और उन्हें कर्ज के बोझ से छुटकारा दिलाया जा सके लेकिन ये सब उन लोगों से बर्दाश्त न हो सका जो अपने आप को कौम के ठेकेदार समझते थे. आजादी के बाद सरदार पटेल व चौधरी चरण सिंह का गरीबों और किसानों के लिए आवाज उठाने का भी यही हश्र हुआ. लेकिन मैं यहाँ साफ़ साफ़ कहना चाहूँगा कि मैं पहले किसान हूँ और राजनेता या मंत्री आदि बाद में हूँ.

किसान की मूलभूत समस्याएँ आज भी फसल का उचित दाम, बढिया बीज, बढिया पानी ही हैं. रोटी, कपड़ा और मकान से जूझता किसान बुरी तरह वर्गीकरण का शिकार है. साधनों और संसाधनों के बंटवारे के बारे में जननायक उपर कह ही चुके हैं. ऐसे में क्या किसान की समस्याओं का हल वर्गीकरण से हो पायेगा? मेरी समझ में वर्गीकरण समस्या का अंत नहीं अपितु शुरुआत है. कंधे पर हल ले जाते, सर पर अनाज उठाते किसान की समस्या का हल तो उसकी माटी और उसकी उपज में है; वर्गीकरण तो केवल माटी का हो सकता है. कोई माटी कम उपजाऊ अथवा अधिक उपजाऊ हो सकती है पर इसके अधिक तो सभी किसान एक ही हैं. यह ठीक है आज वे समुदायों, जातियों अथवा धर्मों में बंटे हुए हैं; लेकिन इस बंटवारे के बावजूद भी उनका धर्म किसानी आज भी जीवित है. इसके अतिरिक्त भला किसान को किस बात की जरूरत? उसे तो वर्ग से मुक्त हो एक दूसरे को खुले मन से पसंद करना होगा. खुले मन से एक दूसरे को गले लगाना ही होगा. इसमें ही उसका भला है; वरना संसाधनों का बंटवारा ऐसे ही 20% वर्ग में होता रहेगा. गर्व से कहो हम किसान हैं और इसके अलावा न हमारा कोई धर्म न कोई वर्ग. समुदाय हो सकता है, लेकिन समुदाय में रहने के बावजूद भी दूसरे समुदायों की रक्षा, इज्जत एवं मान किसान का स्वयम का ही कार्य है. जब किसान वर्ग मुक्त हो जायेगा तब वह जननायक के बताये राजधर्म के लिए सत्ता को झुका सकेगा जिसमें उन्होंने सबके लिए काम, छत, पानी और रोटी की कामना की है.