मैं और मेरे गांधी

हमेशा की तरह आज महात्मा गांधी जी के शहीदी दिवस पर गांधी जी बनाम गोडसे अथवा गांधी जी बनाम अन्य की बहस चली है. इस बहस के दौरान मैं अपने अंदर गांधी को ढूँढने चला. गांधी जी से मेरा क्या रिश्ता है बस यही आज मेरा लेख है. राजनैतिक रूप से बेहद सक्रिय परिवार से सम्बन्ध रखने के कारण मैं गांधी जी से बचपन में ही रूबरू हो गया था. दादा चौधरी दल सिंह आजाद हिन्द फ़ौज के सिपाही रहे और बाद में लम्बे समय तक हरयाणा की राजनीति में सक्रिय योगदान देते रहे. उनका कमरा कोठी में सबसे पहला था. जैसे ही हम उस कमरे में बाहर से अंदर घुसते तो हमें कुछ तस्वीरें दिखती थीं. पहली तस्वीर गांधी जी की थी जिन्हें हम प्यार से बापू कहते हैं. दूसरी तस्वीर नेहरू जी की थी; तीसरी तस्वीर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की थी. अगली तस्वीर शहीद भगत सिंह और अंतिम तस्वीर रहबरे आजम दीनबन्धू सर छोटू राम जी की थी. बचपन में आप इन सब महान विभूतियों में कभी भी समानता नहीं ढूंढ पायेंगे. ऐसा कभी नहीं हो सकता था कि ये सब एक समय एक साथ एक दिशा में सोच सकते थे. पर फिर ये सब सम्मानीय कैसे हुए? मेरे दादा आजाद हिन्द फ़ौज के सिपाही रहे; यह सर्वविदित था कि बोस की कांग्रेस राजनीति का अवसान शायद गांधी जी के कारण हुआ. यह भी सर्वविदित है कि गांधी जी के रहते ही 23 मार्च 1931 को भगत सिंह व साथियों को फांसी दे दी गयी. यह भी सर्वविदित है कि दीनबन्धु सर छोटू राम भी गाँधी से अलग विचारधारा के थे तो ये सब विचार एक साथ एक दीवार पर कैसे रह सकते थे? खासकर भारत की आजादी के महानायक मोहनदास करमचंद गांधी जो सालों से युवाओं की उपेक्षा के शिकार हुए हैं; उनका इस दीवार पर क्या काम?

फिर मैं गांधी जी से मिला. “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” नामक उनकी आत्मकथा से रूबरू हुआ. तब जाकर गांधी जी से मुझे प्रेम हुआ. इतना नैतिक बल! भला इतना नैतिक बल कैसे बापू में हो सकता था कि वे अपनी स्वयम की आत्मकथा में लिख दें कि वे नैतिक रूप से कमजोर साबित हुए. बापू ताउम्र अपने आप से लड़ते रहे. उन्हें बाहर की लड़ाई तो करनी ही थी; पर खुद से लड़ाई सबसे मुश्किल होती रही है. हमेशा राम के नाम को साथ रखने वाले बापू; दलितों को हरिजन नाम देने वाले बापू; हर बात के अंदर गीता के उद्द्र्ण देने वाले बापू कब क्रमशः संघ और अम्बेडकर के विरोध का शिकार हो गये जबकि संघ के लिए राम से ऊपर कोई नहीं. भला बापू ने कहा कब तक कि हिन्दू धर्म छोटा है तो फिर उनकी हत्या कैसे कोई हिन्दू महासभा और संघ का कोई युवक कर सकता था? भला कैसे कोई नाथूराम गांधी के अंत की सोच सकता था? आप जब गोडसे को देखते हैं तो आपको पता लगता है कि बापू की हत्या से पहले उन्होंने उनके आगे हाथ जोड़े; फिर पैरों को हाथ लगाया और अंत में छाती में दो गोली दाग दी. बापू के मूंह से निकले दो शब्द थे “हे राम” और मूंह पर हंसी; ऐसी हंसी जैसे गोडसे को उन्होंने तुरंत माफ़ कर दिया हो; जैसे गोडसे ने उनकी पीड़ा को हर लिया हो. यदि बापू उस हमले में बचते तो शर्तिया गोडसे को क्षमा कर देते. पर वे चले गये क्योंकि वे उपेक्षित थे; वे टूटे हुए थे. उनपर आरोप था कि वे चाहते तो भारत का विभाजन रुक सकता था! पर क्या वह सही था? क्या सच में बापू ने ही विभाजन कराया. इसका सहज ही जवाब आपको इतिहास की पुस्तकों में मिल जायेगा. उनका विभाजन के मामले में स्पष्ट मत था कि उनकी अंतिम सांस तक भारत के टुकड़े नहीं हो सकते. पर उम्र से कमजोर 78 साल के बूढ़े को सुन कर कौन तैयार था? विभाजन के लिए हुए गोलमेज समझौते में उन्हें शामिल तक न किया गया. उन पर आरोप लगा कि वे चाहते तो भगत सिंह की फांसी रुकवा सकते थे. इसका जवाब ढूंढना भी कहाँ मुश्किल था; पर क्या उस बूढ़े के लिए कोई इतनी जहमत उठाने को तैयार था? मैं बता दूं कि सरदार भगत सिंह की फांसी के विरुद्ध पहली अपील ख़ारिज हो जाने के बाद उन्होंने स्पष्ट रूप से दया याचिका लगाने से मना कर दिया था. इसका उत्तर खुद भगत सिंह ने अपने संस्मरणों में दिया है. भगत कहते हैं कि वे जीना नहीं चाहते क्योंकि वे जानते हैं कि उनके जीने का मकसद पूरा हो गया है और अब केवल उनकी कमजोरियां सामने आएँगी. उनकी फांसी के विरुद्ध दया याचिका महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने लगाई. गांधी इरविन समझौते की लम्बी बहस के दौरान 18 फरवरी 1931 को स्वयम गांधी ने भगत की फांसी को टालने की अपील की. पर क्या यह हमने पढ़ा है? ये नहीं पढ़ा है तो 7 मार्च को दिल्ली में हुई उनकी सभा का वक्तव्य अवश्य सुन लेना चाहिए. वे जनसभा में कहते हैं,” अगला सवाल भगतसिंह और दूसरे लोगों के बारे में है, जिनको मौत की सजा दी जा चुकी है। मुझसे पूछा गया है कि जब कि इन देशभक्तों के सिरपर मौतकी छाया मंडरा रही है, शान्ति हो कैसे सकती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन पत्रकों को बांटने वाले नौजवान ऐसी सीधी-सादी बात भी नहीं समझ सकते। उन्हें समझना चाहिए कि हमने कोई शान्ति-सन्धि नहीं की है। सिर्फ अल्पकालीन और अस्थायी समझौता किया है। मैं युवकोंसे प्रार्थना करता हूं कि वे व्यवहार-बुद्धि, आवेशहीन वीरता, धैर्य और विवेकको तिलांजलि न दे दें। मैंने 62 वर्षीय युवक होनेका दावा किया है। परन्तु यदि मुझे जीर्ण-शीर्ण, बूढ़े और पुराणपंथी की संज्ञा भी दे दी जाये तो भी मुझे आपसे विवेकपूर्ण काम करनेकी प्रार्थना करने का अधिकार है। …परन्तु मैं आपको बता दूं कि भगतसिंह और बाकी लोग रिहा क्यों नहीं किये गये हैं। हो सकता है कि यदि आप समझौतेकी बातचीत कर रहे होते तो आप वाइसराय को ज्यादा अच्छी शर्तों के लिये राजी कर लेते, परन्तु कार्यसमिति के लोग तो इससे ज्यादा प्राप्त नहीं कर सकते थे। …समझौता करते समय हम जितना दबाव डाल सकते थे, उतना हमने डाला और अस्थायी समझौते के अन्तर्गत हमें जो-कुछ न्यायपूर्वक मिल सकता था, उससे सन्तोष कर लिया। अस्थायी सन्धि के लिए मध्यस्थता करने वाले हम लोग सत्य और अहिंसाके अपने प्रण और न्यायकी सीमाओं को नहीं भूल सकते थे। परन्तु जिनका आपने नाम लिया हैं, उन सबकों रिहा कराने का रास्ता अब भी खुला है। आप समझौतेको कार्यरूप दें, तो ऐसा हो सकता है। ‘यंग इंडिया’ समझौतेका समर्थन करे और इसकी सारी शर्तों को पूरा करे और यदि ईश्वर ने चाहा और हमारे उपर्युक्त स्थितिपर पहुंचने तक भगतसिंह औरदूसरे लोग जीवित रहे तो वे फांसी के तख्ते पर लटकनेसे ही नहीं बच जायेंगे, रिहा भी कर दिये जायेंगे।
परन्तु मैं ‘यंग इंडिया’ को एक चेतावनी दे दूं। इन चीजोंको मांगना आसान है, पाना नहीं। आप उन लोगों की रिहाई की मांग करते हैं जिन्हें हिंसाके आरोप में फांसी की सजा दी गई है। यह कोई गलत बात नहीं है। मेरा अहिंसा-धर्म चोर-डाकुओं और यहांतक कि हत्यारों को भी सजा देने के पक्षमें नहीं है। भगतसिंह जैसे बहादुर आदमी को फांसीपर लटकानेकी बात तो दूर रहीं, मेरी अन्तरात्मा तो किसीको भी फांसी के तख्ते पर लटकाने की गवाही नहीं देती है। परन्तु मैं आपको बता दूं कि आप भी जबतक समझौतेकी शर्तोंका पालन नहीं करते, उन्हें बचा नहीं सकते। यह काम आप हिंसा द्वारा नहीं कर सकते। यदि आपको हिंसापर ही विश्वास है, तो मैं आपको निश्चयपूर्वक बता सकता हूं कि आप केवल भगत सिंह को ही नहीं छुड़ा सकेंगे बल्कि आपको भगतसिंह-जैसे और हजारों लोगों का बलिदान करना पड़ेगा।“ इस संस्मरण को पढ़ते ही हमें पता लगता है कि बापू कतई भी भगत सिंह की फांसी के पक्षधर नहीं थे और वे स्पष्ट रूप से भगत सिंह को बहादुर व्यक्ति के रूप में तजरीह देते थे. भगत सिंह की फांसी से ठीक चार दिन पहले फिर उनकी वायसराय से मुलाकात हुई. उन्होंने फिर से सजा को टालने की अपील की. दो दिन बाद कुछ पत्रकारों ने बापू से पूछा कि क्या उन्हें फांसी टलने की कोई सम्भावना नजर आती है तो गांधी जी कहते हैं कि लगता तो है लेकिन बहुत कम सम्भावना है. 23 मार्च को ठीक फांसी के दिन गांधी जी वायसराय को चिट्ठी लिखते हैं,

“”१ दरियागंज, दिल्ली
२३ मार्च, १९३१

प्रिय मित्र,

आपको यह पत्र लिखना आपके प्रति क्रूरता करने-जैसा लगता है; पर शांति के हित में अंतिम अपील करना आवश्यक है। यद्यपि ‍‌आपने मुझे साफ-साफ बता दिया था कि भगतसिंह और अन्य दो लोगों की मौत की सज़ा में कोई रियायत किए जाने की आशा नहीं है, फिर भी आपने मेरे शनिवार के निवेदन पर विचार करने को कहा था। डा सप्रू मुझसे कल मिले और उन्होंने मुझे बताया कि आप इस मामले से चिंतित हैं और आप कोई रास्ता निकालने का विचार कर रहे हैं। यदि इसपर पुन: विचार करने की गुंजाइश हो, तो मैं आपका ध्यान निम्न बातों की ओर दिलाना चाहता हूँ।

जनमत, वह सही हो या गलत, सज़ा में रियासत चाहता है। जब कोई सिद्धांत दाँव पर न हो, तो लोकमत का मान करना हमारा कर्तव्य हो जाता है।

प्रस्तुत मामले में स्थिति ऐसी होती है। यदि सज़ा हल्की हो जाती है तो बहुत संभव है कि आंतरिक शांति की स्थापना में सहायता मिले। यदि मौत की सज़ा दी गई तो निःसंदेह शांति खतरे में पड़ जाएगी।

चूँकि आप शांति स्थापना के लिए मेरे प्रभाव को, जैसे भी वह है, उपयोगी समझते प्रतीत होते हैं। इसलिए अकारण ही मेरी स्थिति को भविष्य के लिए और ज्यादा कठिन न बनाइए। यूँ ही वह कुछ सरल नहीं है।

मौत की सज़ा पर अमल हो जाने के बाद वह कदम वापस नहीं लिया जा सकता। यदि आप सोचते हैं कि फ़ैसले में थोड़ी भी गुंजाइश है, तो मैं आपसे यह प्रार्थना करुंगा कि इस सज़ा को, जिसे फिर वापस लिया जा सकता, आगे और विचार करने के लिए स्थगित कर दें।

यदि मेरी उपस्थिति आवश्यक हो तो मैं आ सकता हूँ। यद्यपि मैं बोल नहीं सकूंगा, [महात्मा गांधी उस दिन मौन पर थे] पर मैं सुन सकता हूँ और जो-कुछ कहना चाहता हूँ, वह लिखकर बता सकूँगा।

दया कभी निष्फल नहीं जाती।

मैं हूँ,

आपका विश्वस्त मित्र”

23 मार्च को भगत को फांसी दे दी गयी; उन्होंने आम वक्तव्य जारी कर भगत सिंह और साथियों की प्रशंसा भी की. पर वह प्रशंसा अब बेमानी हो जाती है क्योंकि भगत सिंह जा चुके थे. रह गया था तो उस बूढ़े व्यक्ति पर सदियों का बोझ कि वे बापू जो अपने विचार और प्रण की वजह से कांग्रेस के अंदर ही साइड कर दिए गये थे वे बापू भगत सिंह को एक मसीहा की तरह बचा सकते थे. यदि गांधी की इतनी ही चलती तो वे 1920 में ही अंग्रेजों को चलता कर देते. पर उनके आन्दोलन 1943 तक जारी रहे. गांधी अंहिंसा के ही तो पुजारी थे. मुझे समझ नहीं आता अहिंसा में इतना भी क्या गलत है कि गांधी जी के मरने के इतने साल के बाद भी उनका मान मर्दन किया जा रहा है. खुद भगत सिंह हिंसा के मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहते हैं, “मैं आतंकवादी नहीं हूँ, सिवा क्रन्तिकारी जीवन के आरम्भ में और अब मुझे पूरा विश्वास हो चुका है कि हम लोग उन तरीकों से कुछ भी हासिल नहीं कर सकते.” आप भगत को देख लीजिये, वे कब बड़े हुए? भगत बड़े हुए अहिंसा अपना कर. असेम्बली में बम फैंक कर उन्होंने कहा कि वे किसी को नुक्सान नहीं पंहुचाना चाहते पर अपनी बात कहना चाहते हैं. वे बड़े हुए जेल में विश्व की शायद सबसे लम्बी भूख हडताल के बाद और अपने विचारों के कारण जिनमें तब तक हिंसा समाप्त हो गयी थी. तो गांधी को गाली क्यों? आजाद ने भी तो अपनी मृत्यू से पहले मान लिया था कि हिंसा से वे कुछ न कर पाए. क्या बोस आजाद हिन्द फ़ौज बना आजादी ला पाए? बोस को तो जापान और जर्मनी का सीधा समर्थन हासिल था. पर क्या बोस की महानता कभी कम हुई? दुर्भाग्य देखिये गांधी बनाम भगत और बोस बनाम नेहरू कह आज तक इतिहास के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है. नेहरू को बोस से इतनी ही दिक्कत थी तो विश्व प्रसिद्ध ट्रायल जिसमें आजाद हिन्द फौज के सैनिकों के विरुद्ध दिल्ली लालकिले में मुकद्दमा चला था उस में सैनिकों के वकील न बनते. पर हम कहाँ मानने वाले हैं? नायकों को खत्म करने की जो ठानी है.

जैसे ही मैं यह सब पढ़ पाया; समझ पाया तो मुझे पता लग गया कि गांधी, बोस, नेहरू, सर छोटू राम, भगत सिंह एक दीवार पर एक साथ आ सकते थे. क्योंकि उनके विचार अलग थे; तरीका भी अलग था लेकिन केवल रास्ते ही अलग थे. रास्ता चुनने का अधिकार स्वाभाविक स्वतंत्रता है; इसमें गांधी का क्या दोष? दक्षिण अफ्रीका तक में रंग भेद मिटाने वाले बापू को जब दलित विरोधी बताया जाता है तो अंदर कुछ चुभता है. आजीवन शुद्ध हिन्दू शैली से अपना जीवन व्यतीत करने वाले गांधी जी को जब हिन्दू विरोधी कहा जाता है तो कुछ चुभता है; जब भगत के खिलाफ उन्हें खड़ा कर छोटा किया जाता है तो कुछ चुभता है; जब उन्हें कभी बोस के विरुद्ध खड़ा किया जाता है तो कभी हरयाणा के बडबोले मंत्री तक उनके बारे में अभद्र भाषा का उपयोग करते हैं तो कुछ चुभता है. अगर बापू से मुकाबला करना है तो कहो सब भारतियों को कि लिख डालें उन्होंने कौन कौनसे गलत कार्य किये हैं और बता दें सबको. जब सब बता दें और आत्मा शुद्ध हो जाये तो करें देश की सेवा. आइन्स्टाइन ऐसे ही नहीं कहते थे कि आने वाली पीढियां सहज विश्वास नहीं करेंगी कि हाड मांस से चलने वाला ऐसा कोई इंसान इस धरती पर कभी पैदा हुआ था. मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला भी शायद गलत ही हों अगर गांधी गलत थे तो. पर गांधी जी एक कृतग्य राष्ट्र का एक बाशिंदा शर्मिंदा है कि साल दर साल आपको छोटा बनाकर दिखाया जाता है और हम सब चुप रहते हैं. मेरा रिश्ता आपसे कभी न छूट पाया क्योंकि आप मेरे अपने हैं; पराये नहीं. आपके लिए ग़ालिब की ग़ज़ल की दो पंक्तियाँ छोड़ रहा हूँ:

“जिक्र उस परी-वेश का और फिर बयाँ अपना,

बन गया रकीब आखिर था जो राजदां अपना”

परी-वेश: सुंदर, रकीब: दुश्मन, राजदां: वह जो दूसरों के राज जानता है.

जब ईशावास्योपनिषद् में लिखा भारत में हर नागरिक पढ़ता है कि हमेशा सत्य की जीत होती है (सत्यमेव जयते) तो हर दम आपकी हार दिल में चुभती है. मैं आपसे सीख रहा हूँ; मैं सीख रहा हूँ कि उस स्वतंत्रता का कोई फायदा नहीं जिसमे गलतियाँ करने का अधिकार न हो. सत्य के साथ अभिन्न प्रयोग जारी हैं. असमानता को मिटाने के प्रयोग जारी हैं. आपसे और भगत दोनों से प्यार करने का संकल्प जारी है. आप छोटे नहीं; आप मेरे दिल में हैं; भले किसी और को पसंद हों न हों; मेरे साथ आप अवश्य रहेंगे. जब 80 वर्ष के बापू नोआखली में गये थे तो एक दिन में सभी दंगे बंद हो गये थे. वे लोग आपसे क्यों प्यार करते थे कि एक दूसरे के दुश्मन होते हुए भी आपके आगे झुक गये. आप छोटे कहाँ? आप तो कमजोर हो गये; अच्छा हुआ आप चले गये क्योंकि आप की कांग्रेस के द्वारा उपेक्षा; मुस्लिम लीग द्वारा उपेक्षा, हिन्दू महासभा द्वारा उपेक्षा आप कहाँ झेल पाते? गोडसे ने तो आपको आपकी पीड़ा से मुक्त किया; पर आपके विचारों के साथ आप जिन्दा हैं और जिन्दा रहेंगे बापू.

एक कृतज्ञ नागरिक का नमन!