नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का आगमन

मेरे दादा चौधरी दल सिंह जी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के लिए भर्ती अधिकारी के रूप में जर्मनी में शामिल होने का मौका मिला। इस दौरान कुछ अभूतपूर्व घटना क्रम हुआ जिसमें नेताजी को जर्मनी में जंगी कैम्प में बोलने से रोकने की कोशिश की गयी। आज नेता जी की जयंती पर मैं वह घटना क्रम आप सब के सामने रखना चाहता हूँ। यह उद्धरण उनकी पुस्तक “A Prisoner of War and Peace” में से लिया गया जिसका मैंने अनुवाद किया है; पर इसे अभी पब्लिश नहीं किया गया है।

अक्टूबर 1941 की शुरुआत में बंदियों के लिए प्रकाशित होने वाले “द गेम्प” नामक साप्ताहिक में आया, “सुभाष चन्द्र बोस, अंग्रेजी जेल अधिकारियों को धोखा देकर भागे और जर्मनी पंहुचने वाले हैं”। इस खबर पर बहुत कम लोगों ने विश्वास किया क्योंकि फौजी लोगों का सोचने का स्तर सीमित होता है, और दूसरा अंग्रेजों का गंभीर प्रभाव जो अब तक उन सब के दिमाग पर था। यह सोचा गया कि इस खबर के पीछे जरूर कोई जर्मन सोच है। पर वो लोग जो समझदार थे उन्होंने खबर पर विश्वास कर लिया क्योंकि कुछ दिन के बाद सच्चाई सामने आने वाली थी।

      18 अक्टूबर 1941 की सुबह रोल कॉल(बंदियों की गिनती) के दौरान घोषणा की गयी कि 20 अक्टूबर 1941 को भारत के एक महान नेता सुभाष चन्द्र बोस भाषण देंगे। यह सुन कर बंदी झूमने लगे; पर कुछ ऐसे भी थे जो इस बात से चिढ गए तथा साजिश करने लगे। उस समय कैम्प में लगभग 8000 बंदी थे। रात को रिसालदार मेजर सीस राम और बाद में कप्तान जो रोहतक के गाँव खरड का रहने वाला था उसने सभी अफसरों की एक मीटिंग बुलाई और उसमें कहा कि यह सच भी हो सकता है तथा गलत भी हो सकता है। डाक्टर बोस, जो उनमें से एक थे वे सुभाष चन्द्र बोस को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने कहा कि यदि यह सच हुआ कि वे सुभाष चन्द्र बोस हैं तो वे सकारात्मक चिह्न बनायेंगे और यदि कोई नकली हुआ तो वे नकारात्मक चिह्न बना देंगे। अतः उन सब को उसके सिग्नल का इंतजार करना होगा। उसके कहने पर ही लोग भाषण के अन्दर जायेंगे अथवा मना कर देंगे। जैसा कि कहा गया है कि आर्मी के लोगों का मानसिक स्तर सीमित होता है तो सबने बिना किसी समझ के विश्वास कर लिया और वे नहीं जानते थे कि यह सब एक साजिश थी।

कैम्प के बाहर बंदियों के लिए दो बहुत बड़े भवनों का प्रबंध किया गया और सुभाष चन्द्र बोस के आगमन से पहले हमें बैठने के लिए कह दिया गया। सही समय पर सुभाष चन्द्र बोस उच्च जर्मन अधिकारियों, उच्च पदाधिकारियों तथा प्रेस के लोगों के साथ आ गए। वे सैंकड़ों गाड़ियों के एक काफिले के साथ आए थे। गार्ड ऑफ़ ऑनर के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने भवन में प्रवेश किया। सभी की आँखें डाक्टर बोस के ऊपर लगी थीं और क्योंकि यह पहले से सोची समझी मना करने की साजिश थी तो कुछ सैनिकों ने बात करना शुरू कर दिया, कुछ ने खांसना शुरू कर दिया तथा विघ्न पैदा हो गया। पर कुछ समझदार बंदी ध्यान से सुनते रहे।

भाषण

श्री सुभाष चन्द्र बोस ने लगभग डेढ़ घंटे का गरिमापूर्ण भाषण दिया। भाषण में सभी प्रकार की वर्तमान परिस्थितियों को शामिल किया गया था। मैंने सम्पूर्ण भाषण को शब्दवार लिखा था पर रिहाई के बाद जब मैं इंग्लैंड गया तो वह नोटबुक कब्जे में कर ली गयी। नेताजी ने शुरुआत में कहा कि मेरे प्यारे देश वासियों मैं आप सब को विदेशी धरती पर कैद देख कर दुखी हूँ। कुछ चांदी के सिक्कों के कारण आप सब को दूसरों को ग़ुलाम बनाने लिए विदेश में लाया गया है जबकि आप स्वयं गुलाम हैं। आप समझ सकते हैं कि अंग्रेजों के पंजे से बाहर निकलने के लिए मुझे किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा होगा और कितनी मुश्किल यात्रा करनी पड़ी होगी। यह एक लम्बी कहानी है जो इस समय अप्रासंगिक है। मेरा एक मात्र लक्ष्य है और वह है भारत माँ को आजाद करवाना और यह केवल तभी संभव है जब आपमें से कुछ लोग अपनी जान न्यौछावर करने के लिए तैयार हों। मैं चाहता हूँ कि केवल वही लोग आगे आयें जो भारत माता के लिए हंसकर अपनी जान देना चाहते हों।

मैं आपको आजादी का विश्वास दिलाता हूँ। यह एक नकली विश्वास नहीं है। आजादी के बाद इन सेनाओं का मुख्य कमान अधिकारी एक भारतीय होगा, गवर्नर, न्यायाधीश, DC एवं SP और समस्त प्रशासन भारतीयों के हाथ में होगा। उन्होंने कहा कि जर्मन हमारे दोस्त नहीं पर दुश्मन के दुश्मन हैं। अंग्रेज हमारे दुश्मन हैं और जर्मन अंग्रेजों के दुश्मन हैं इसीलिए हमें अपने दुश्मन के दुश्मन के साथ मिल कर भारत माँ को आजाद करवाने का लाभ प्राप्त करना चाहिए।

भाषण का अंत

 नेताजी ने कहा, “ आज जर्मन विजयी हैं और सभी दिशाएँ उनके पक्ष में चल रही हैं। सभी की जुबान पर हिटलर और बर्लिन का नाम है। मैं नहीं कह सकता कि इस द्वितीय विश्व युद्ध का क्या नतीजा होगा पर इतना मैं अवश्य विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अंग्रेज भारत में नहीं रहेंगे। भारत माता के लिए खून देकर उसे आजाद करवाइए।”

नेताजी हिन्दुस्तानी कैम्प में

 हम सब चार व्यक्ति जो बर्लिन से एक विशेष मिशन पर इस कैम्प तक भेजे गए थे, हम सब हमारे साथियों के रूखे व्यवहार से निराश थे। दूसरे दिन; सुभाष चन्द्र बोस ने कैम्प में आना था। रिसालदार मेजर ने फिर से साजिश की और हुक्म सुनाया कि कोई भी बंदी नेताजी के आगमन के दौरान बैरक से बाहर नहीं निकलेगा। रात को हम चार और वो लोग जो हम सब से सहमत थे; हमने एक मीटिंग गुरुद्वारा(कैम्प में तैयार की गयी जगह) में बुलाई और यह तय किया गया कि नेताजी का गेट पर स्वागत होना चाहिये। यह सूचना जर्मन कैम्प कमांडर को रात को दे दी गयी ताकि रिसालदार मेजर दोबारा से व्यवधान न पैदा कर सके। पहले की योजना के तहत मैं बैरक से सुबह साढे नौ बजे बाहर निकल गया और मुझे बाहर जाते देख रिसालदार मेजर मेरे पीछे आया और कहा कि मुझे गेट से बाहर नहीं जाना है और मुझे बैरक में वापिस आना है। पर मैंने उसे अनसुना कर दिया तथा गेट पर पंहुच गया। ज्ञानी सोहन सिंह तथा अन्य साथी भी उसके हुक्म को अनसुना कर गेट तक आ गये।

 रिसालदार मेजर भी स्वयं गेट तक आ गया ताकि वह हम सब को वापिस बुला सके पर जर्मन अफसर ने उसे रोक दिया और उसे माफ़ी मांग कर वापिस आना पड़ा।

नेताजी जर्मन अफसर, प्रेस के लोग, फोटोग्राफर तथा पहरेदारों और अपने शुभचिंतकों से घिरे हुए कारों के काफिले के साथ ठीक गेट पर पंहुचे। हमने सुभाष चन्द्र बोस अमर रहें, गाँधी और नेहरू अमर रहें के नारे लगाए। यह सुन कर, सारा कैम्प बाहर निकल आया और बंदी भाव-विभोर होकर जमीन पर लेट गए। नेताजी ने उन सब की प्रशंसा करते हुए उनको होंसला दिया। कैमरामैनों ने सैंकड़ों फोटो खींची। यह जबरदस्त नजारा था। ऐसा लग रहा था कि बंदी पिछली बार के कारण पश्चाताप कर रहे थे।

 बोस बाबू ने छोटा सा भाषण दिया और आखिर में कहा कि उन्होंने कैम्प कमांडर को कह दिया है कि बंदियों का ठीक से ख्याल रखा जाएगा। अगले दिन एक वर्कशॉप खुली जहाँ छोटी मोटी मरम्मत का कार्य हो सकता था; नाइयों को औजार दे दिए गए ताकि वे बंदियों की नित्य हजामत कर सकें और नित्य काम आने वाली चीजें पैसों में उपलब्ध करवा दी गयीं। रात को हम चार लोगों को नेताजी से मिलवाया गया और यह तय हुआ कि जर्मनी में भारतीय सैन्य दल बनाया जाए और इस कार्य के लिए हम सब को भर्ती के लिए लगा दिया गया।

भारतीय सैन्य दल की स्थापना

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जर्मनी आगमन पर भारतीय सैन्य दल की स्थापना हुई जिसे जापान में INA का नाम दिया गया।

भारतीय सैन्य दल का मुख्यालय बर्लिन में स्थापित किया गया तथा इसका सैन्य मुख्यालय क़ुनिएस्बेर्ग में स्थापित किया गया जहाँ पर पचास भारतीय विद्यार्थी तथा कुछ अन्य नागरिकों ने द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ से पहले कार्य किया था। इसके अलावा इन चार बंदियों को जो सिसिली से जर्मनी आये थे उनको भी इस कैम्प में भेज दिया गया। क़ुनिएस्बेर्ग से खबरें भारत पंहुचने का प्रबंध किया गया। इसे आजाद हिन्द रेडियो के रूप में प्रसारित किया गया। जो बंदी एना-बर्ग से क़ुनिएस्बेर्ग में अन्य कैम्प में कार्य के नाम पर भेजे गये थे, उन्हें क़ुनिएस्बेर्ग जहाँ उन्हें छोड़ दिया गया उन्हें सरकारी कैंटीन से सामान खरीदने की इजाजत दे दी गयी। उनको काफी मात्र में राशन और जरूरी सामान दे दिया गया। उसके अलावा प्रेरणादायक भाषण और अन्य कार्यों के द्वारा उन्हें भारत से प्रेम तथा अंग्रेजो से नफरत की शिक्षा दी गयी और उनके लिए ऐसा माहौल तैयार किया गया कि वे भारतीय सैन्य दल में शामिल होने के लिए तैयार हो जाएँ। बनाये गए माहौल ने बंदियों को सैन्य दल में स्वयम इच्छा से शामिल होने पर मजबूर कर दिया। जो बंदी सैन्य दल में शामिल न होने पर उतारू थे उन्हें एक अन्य कैम्प में फ़्रांस भेज दिया गया। एक साल तक किसी को नहीं पता था कि वे लोग जो कार्य के लिए भेजे गये थे वे कहाँ गये और उनका क्या हुआ और किसी ने भी भारतीय सैन्य दल की स्थापना का स्वप्न नहीं लिया।

भर्ती अधिकारी के रूप में

 जैसा कि बताया जा चुका है कि मुझे और तीन अन्य को भर्ती की जिम्मेदारी दी गयी थी। सभी को एक सप्ताह में कम से कम ऐसे सात सदस्य चुनने के लिए कहा गया था जो देश भक्ति की भावना से ओत प्रोत हों और जिनका नाम जर्मन कैम्प कमांडर को देना था और भर्ती के समय एक बात का ध्यान रखना आवश्यक था कि उनमें अंग्रेजों के लिए घृणा हो। जो 28 बंदी चुने गए उन्हें सोमवार को क़ुनिएस्बेर्ग भेज दिया गया और उन्हें सैन्य दल में शामिल होने की प्रेरणा दी गयी। यह बेहद गुप्त था और यह कार्य नेताजी के रहने के दौरान और उसके बाद भी चलता रहा। इस बारे में मैंने और सरदार सोहन सिंह ने नेताजी से तीन बार बर्लिन में मुलाकात की और उन्हें लिखित में रिपोर्ट पेश कीं।

सैन्य अनुशासन के अनुसार सभी योजनायें बनायी गयीं। तीन बटालियन बनायीं गयीं और जिनमें सभी कमांडर और कंपनी कमांडर जर्मन अधिकारी थे।

भारतीय ब्रिगेड हाथ में रखने योग्य हथियारों जैसे मशीन गन, मोर्टार, रायफल, टैंक भेदी बन्दूक, ग्रेनेड और रिवोल्वर आदि से लेस थीं। इस ब्रिगेड को वहां लगा दिया गया जब जर्मन सेनायें समुद्र तट की सीमा के समीप रक्षा कर रही थीं। पर जब Normamdy के अन्दर ब्रिटिश सेनाएं आयीं और आगे बढ़ना शुरू किया तो उनकी लड़ाई भारतीय सैन्य दल से हुई। इस से भारतीय सैन्य दल को बहुत नुक्सान पंहुचा और आखिर में बून के समीप भारतीय सैन्य दल ने समर्पण कर दिया और जो जिन्दा बचे उन्हें बंदी बना लिया गया। इन सब बंदियों को इटली ले जाया गया और वहां से टोरंटो बंदरगाह ले जाया गया और वहां से उन सब को 1945 में बॉम्बे भेज दिया गया। बॉम्बे से इन बंदियों को रोहतक जिले के असौढ़ा कैम्प भेज दिया गया जहाँ उन पर विद्रोह का केस चला। इन्क्वायरी के समय इन सब को तीन भाग भूरा, लाल और सफ़ेद में बाँट दिया गया। पर सारा भारत इन देश भक्तों के पक्ष में बोल रहा था। पंडित जवाहर लाल नेहरु, श्री भोला भाई देसाई और अन्य प्रमुख वकीलों ने उनका बचाव किया। जिसके बाद 1948 में उन्हें छोड़ दिया गया। जिन्होंने भारतीय सैन्य दल को ज्वाइन किया थ उनको न तो पेंशन दी गयी और न ही जेल के दौरान समय की तनख्वाह दी गयी।

हिंदी भाषा का सिखाना

जो जर्मन अफसर भारतीय बंदी कैम्प के साथ जुड़े हुए थे उनको हिंदी सीखने की गंभीर इच्छा थी। बंदी भी हिंदी सीखना चाहते थे। मैंने कैम्प कमांडर से संपर्क किया और एक हफ्ते के अंसार ही आवश्यक वस्तुएं जैसे ब्लैक बोर्ड, एक्सरसाइज बुक, स्याही की दवाते, पेन्सिल आदि दे दी गयीं और क्लास शुरू हो गयी। दो सेक्शन बनाये गए। एक सेक्शन को मैंने पढाया तथा दूसरे सेक्शन को भीम सिंह अजमेरी ने पढाया। इस ही प्रकार सीखने वालों ने जर्मन भाषा सीखी। ये सब क्लास नित्य 1940 से 1943 तक होती थीं और इस समय के दौरान लगभग एक हजार बंदियों ने हिंदी सीखी।

नेताजी का जापान प्रस्थान

भारतीय सैन्य दल की स्थापना के बाद नेताजी ने जापान जाने की इच्छा जाहिर की। हिटलर ने नौसेना अधिकारियों को बुलाया और उनको रिपोर्ट देने के लिए कहा। रिपोर्ट में कहा गया कि यह सब खतरे से भरा है और बचने की सम्भावना केवल 25% हैं क्योंकि मित्र सेना की नौसेना अधिक मजबूत है और रास्ते में जापान की पनडुब्बियों को भी आना पड़ेगा। नेताजी को बता दिया गया। नेताजी ने कहा अगर बचने की सम्भावना केवल एक प्रतिशत भी हुई तो भी वे जायेंगे। नेताजी ने एक जापानी पनडुब्बी में सवारी की और उनके साथ मेरे सेक्शन का एक जवान कँवल सिंह गया।