राजीव लोंगोवाल समझौता और हरियाणा के हित!

Rajiv Longowal

आज कल कांग्रेस के द्वारा एक नया जुमला चलाया जा रहा है. हरियाणा कांग्रेस; जिसमें ख़ास कर भूपिंदर हुड्डा कांग्रेस आजकल कह रही है कि इनेलो को SYL पर नहीं बोलना चाहिए क्योंकि उसने राजीव लोंगोवाल समझौते का विरोध किया था. उनके इस मिथ्या प्रचार को तोड़ने के लिए और इस कथित समझौते की सच्चाई बताने के लिए यह लेख लिख रहा हूँ.

पंजाब को SYL के बाद राजनैतिक दलों ने भावनाएं भड़का कर आतंकवाद में धकेल दिया. कपूरी गाँव में लगाया गया मोर्चा आगे जाकर धार्मिक आतंकवाद में बदल गया जिसका खामियाजा इंदिरा गांधी को उठाना पडा. भिंडरावाला को कांग्रेस ने अकाली के पंथक एजेंडे को कमजोर करने के लिए खड़ा किया था. भिंडरावाला की मजबूती बाद में खालिस्तान मूवमेंट में बदल गयी और समस्या इंदिरा के बस से बाहर हुई. खैर हमारा मुद्दा यह नहीं; हमारा मुद्दा राजीव लोंगोवाल पेक्ट है जो बनाया गया था पंजाब की समस्या के लिए लेकिन नुक्सान करना चाहता था हरियाणा का; जिसका लिमिटेड विरोध चौधरी देवी लाल जी ने किया. इसे हम SYL के बनने की गति से समझते हैं. मई 1982 से जून 1986 तक भजन लाल सरकार के दौरान लाइनिंग का 4.72% कार्य हुआ. जून 1987 से जुलाई 1990 तक लाइनिंग का 56% कार्य हुआ. इस दौरान 10 बड़े और 37 मध्यम दर्जे के क्रोस ड्रेनेज के कार्य हुए तथा 62 पुलों का निर्माण हुआ. इस बीच 24 जुलाई 1985 को राजीव लोंगोवाल समझौता हुआ. इस समझौते पर चौधरी भजन लाल और चौधरी बंसी लाल कुछ नहीं बोले; लेकिन चौधरी देवी लाल ने इस समझौते की धारा 7 और 9 पर अपनी आवाज उठाई. इस समझौते के तहत चंडीगढ़ का पंजाब को स्थानान्तरण 26 जनवरी 1986 को करना था और उसके बदले एक ट्रिब्यूनल की घोषणा होनी थी जिसके तहत पंजाब के हिंदी भाषी क्षेत्रों को ढूंढ कर हरियाणा में शामिल कराया जाना था. इसके अतिरिक्त एग्रीमेंट के तहत हरियाणा को जो पानी मिलना था उस पानी की कंडीशन को हटा कर इस मामले को दोबारा ट्रिब्यूनल को भेजने की बात की गयी. समझौता केवल नहर बनवाने की बात करता था; उसमें कितना पानी आएगा यह ट्रिब्यूनल पर छोड़ दिया गया जबकि हरियाणा और पंजाब के बीच हुए एग्रीमेंट के तहत पहले ही पानी की quantity तय हो चुकी थी. चौधरी देवी लाल ने इसका विरोध किया और न्याय युद्ध छेड़ने की बात की. 17 अक्टूबर को उन्होंने हरयाणा के सभी कांग्रेसी विधायकों एवं सांसदों को पत्र लिखा कि वे इस समझौते के विरोध में इस्तीफा दें क्योंकि इससे हरयाणा के हित बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. इससे पहले चौधरी देवी लाल व डाक्टर मंगल सेन ने 14 अगस्त को विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया. श्रीमती चन्द्रावती के नेतृत्व में 20 अन्य विधायकों ने भी त्याग पत्र दे दिए. लेकिन केवल चौधरी देवी लाल जी और डाक्टर मंगल सेन के त्याग पत्र को स्वीकार किया गया और 22 सितम्बर को उपचुनाव की तिथि घोषित की गयी. महम से लडे चौधरी देवी लाल 11,369 वोटों से विजयी घोषित हुए लेकिन डाक्टर मंगलसेन हार गये. इस चुनाव के तुरंत बाद विपक्ष की नेता श्रीमती चन्द्रावती का इस्तीफा भी स्वीकार कर लिया गया. इस्तीफे का फैंसला 9 अगस्त 1985 को रोहतक में हुई संगर्ष समिति की बैठक में लिया गया. इसमें टी हुआ कि सभी विधायक 12 अगस्त तक इस्तीफा दे देंगे. जहाँ लोकदल के सभी विधायकों ने इस्तीफा दे दिया वहीं भाजपा टालमटोल करती रही और केवल डाक्टर मंगल सेन ने इस्तीफा दिया; बाकी का इस्तीफा नहीं हुआ. ज्ञातव्य है कि संघ संचालक श्री बाला साहेब देवरस (दैनिक ट्रिब्यून, 12 अगस्त 1985) ने समझौते का स्वागत किया था. इसकारण भाजपा में खलबली थी. इसके बाद 5 दिसम्बर 1985 को दिल्ली चलो अभियान प्रारंभ हुआ जो 19 दिसम्बर को दिल्ली के रामलीला मैदान की विशाल जनसभा में बदल गया. इसकी पुष्टि जनसत्ता अपने 21 दिसम्बर के सम्पादकीय में निम्न रूप में करता है:

“सालों बाद दिल्ली में ऐसी रैली हुई जिसमें लोग ट्रकों, बसों और रेलगाड़ियों से लाये नहीं गये थे. उन्हें आने का खर्चा नहीं दिया गया था और उन्होंने किसी नेता के हाथ मजबूत नहीं करने थे. हरियाणा से संसद का घेराव करने आये न्याय यात्रियों को गुरुवार को दिल्ली में देखना दो मायनों में आश्वस्त करता था. एक, जन-राजनीति का जमाना लद नहीं गया है और लोगों को बात ठीक से समझाई जाए तो वे सीधी राजनैतिक कार्यवाही में शामिल हो सकते हैं. दो, यह धारणा गलत है कि इस देश के गाँवों और कस्बों के लोग अन्याय के विरुद्ध लड़ाई के मैदान में उतरना नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें दाल रोटी की पड़ी रहती है. इस रैली की आलोचना सिर्फ इस मुद्दे पर की जा सकती है कि क्षेत्रीयता और अपने राज्य के हित स्वार्थ के लिए लोग आये थे. एक राज्य को दूसरे राज्य के विरुद्ध भडकाना आसान है और हरियाणा तो पंजाब से भाई की तरह अलग हुआ है और भाइयों में इर्ष्य और होड़ बढ़ाने के लिए कोई बड़े सिद्धांतों की जरूरत नहीं होती. लेकिन, इस न्याय मार्च के सेनापति चौधरी देवी लाल ने कहा कि वे राजीव-लोंगोवाल समझौते के विरुद्ध नहीं हैं. चौधरी देवी लाल और उनके साथियों ने ये भी कहा है कि हरियाणा के लोग न अकालियों के विरुद्ध हैं न पंजाबियों के. यह ‘न्याय रैली’ राजीव-लोंगोवाल समझौते की धारा 7 और 9 के विरुद्ध है क्योंकि वे मानते हैं कि ये धाराएँ हरियाणा के हितों के विरुद्ध हैं.

चंडीगढ़ पंजाब को देने की तिथि बाद में केंद्र को बढ़ानी पड़ी. नई तिथि 21 जून 1986 रखी गयी. इस दिन चौधरी साहब ने हरियाणा बंद की घोषणा कर दी. 22 जून को नवभारत टाइम्स लिखता है,”बंद में सभी दलों के कार्यकर्ता और नेता शामिल थे, लेकिन जैसे सारे बंद पर चौधरी देवी लाल का विशिष्ट प्रभाव नजर आ रहा था. कई जगह लोकदल के हरे झंडे फहराए गये थे और दीवारों पर देवी लाल के पोस्टर लगे थे. ‘बंद’ यह बता रहा है कि हरियाणा के लोग राजीव-लोंगोवाल समझौते को चाहे सही या गलत, अपनी निगाह से देखने लगे हैं और वे एक साथ राजीव-लोंगोवाल समझौते, केंद्र सरकार और बंसी लाल के खिलाफ हैं.

इसके बाद जो हुआ वह एतिहासिक ही तो था; हरियाणा ने एक साथ 90 में से 85 सीट देकर चौधरी साहब को सही साबित किया. प्रश्न तो जायज ही हैं; चंडीगढ़ पंजाब को क्यों और उसके बदले बैकवर्ड इलाके के कुछ गाँव हरियाणा को? जब 1976 की अधिसूचना के अनुसार हरियाणा के हिस्से में 3.5 MAF पानी आया था तो उसे पहले 1982 में भजन सरकार के द्वारा कम करना और फिर राजीव लोंगोवाल समझौते के बाद तो इसे ठंडे बस्ते में ही डाल देना; यह कहाँ का न्याय था? जब वह न्याय था ही नहीं तो हुड्डा साहब की राजनीति क्यों? खैर SYL पर चौधरी बंसी लाल को ही सुन लीजिये:

19 दिसम्बर 1991 को हरियाणा विधानसभा में लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए चौधरी बंसी लाल कहते हैं,”स्पीकर साहब, यह हमको माननी पड़ेगी कि ज्यादा काम 1987 के बाद की सरकार ने किया. ऐसा नहीं है कि मेरी चौधरी देवी लाल या उनकी पार्टी वालों से कोई मोहब्बत है. असलियत को कौन भुला सकता है. यह रिकोर्ड की बात है 40 लाख क्यूबिक मित्र काम हमारे जाने के बाद 31 मार्च 1988 तक हो गया. मैं इस बात से इनकार नहीं करता कि ड्रेनेज और पुलों के ज्यादा काम वर्ष 1987 के बाद ही पूरे हुए हैं जबकि पुलों और ड्रेनेज का काम मेरे और श्री भजन लाल के समय में पूरा नहीं हुआ.” वे आगे कहते हैं,” स्पीकर साब इनकी (भजन लाल) की सरकार आने के बाद काम नहीं हुआ. मेरी चौधरी देवी लाल से कोई दोस्ती नहीं हो गयी है, जितना मैं पहले खिलाफ था, उतना ही आज हूँ. लेकिन जो किसी ने काम किया, उसकी तो तारीफ करनी ही पड़ेगी.”

शायद उपरोक्त पर श्रीमती किरण चौधरी जी इमानदारी से जवाब जरूर देंगी? सच सच ही होता है भले उसे किसी भी रूप में पेश किया जाए. यह सच ही है कि इनेलो सरकार ने 2002 में निर्णय हरियाणा के पक्ष में कराया. यही निर्णय तो है जिस पर वर्तमान में भाजपा कूद रही है. कांग्रेस की स्थिति खासकर चौधरी भूपिंदर सिंह हुड्डा कांग्रेस की स्थिति और भी हास्यास्पद है. उनके राज के दौरान मामले की 17 बार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई लेकिन वह सुनवाई केवल वकीलों के बिल बनाने के लिए हुई जैसा कि मैंने अन्य लेख में स्पष्ट किया था. पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट बनाने वाले श्री हरभगवान सिंह से हुड्डा साहब के रिश्ते और उनके सुपुत्र को दिए गये ओहदे और इनाम से स्थिति और भी साफ़ हो जाती है. खैर, बोलने में क्या जाता है; बोलते रहिये; इसकी ही तो खाते हैं आप! वैसे भी महम उपचुनाव की जीत ने चौधरी देवी लाल जी के न्याययुद्ध पर पहले ही स्वीकृति की मोहर लगा दी थी और बाद में मुख्य चुनावों ने रही सही कसर पूरी कर दी.