तैमूर लंग और दादावीर हरवीर गुलिया

Taimur

जब से करीना और सैफ के पुत्र हुआ है और उसका नाम उन्होंने तैमूर रखा है; संघ ने एक तरह से आदेश पारित कर तैमूर के नाम को ट्रेंड करवा रखा है. इससे दो तीन दिन से नोटबंदी पर बुरी तरह से घिरी हुई भाजपा को कुछ राहत मिली है. मुझे भाजपा के एक स्रोत ने माफ़ी सहित बताया कि हालाँकि वह इस मामले पर कुछ कहना नहीं चाहता लेकिन मजबूरी है; आदेश हैं कि तैमूर को जीवित रखो. खैर तैमूर को तो नरक में जाए आठ सौ साल हो गये लेकिन उसके सहारे आजकल भाजपा खुद को जिन्दा रखे हुए है. इस बीच हरयाणा का मानस  अपने इतिहास को जाने तो मैंने कुछ जानकारी आपके लिए इकट्ठा की है; जानिये कैसे एक सर्वखाप सेना ने तैमूर के आतंक को खत्म किया था.

चंगेज खान के नक्शे कदम पर चल कर कैसे पहुंचा हिंदुस्तान?

तैमूर का मतलब होता है आयरन यानी लोहा. ये तुर्की भाषा का शब्द है. पर सुनते ही दिमाग में तैमूरलंग का नाम आता है. तैमूर लंगड़ा. जब तैमूर यंग था तब एक भेड़ चुराने गया था. गड़ेरिये ने इसे तीर मार दिया. दाहिने हाथ और दाहिने पैर में. हाथ की दो उंगलियां चली गईं. पैर से लंगड़ा हो गया. नाम हो गया तैमूरलंग. वह तुर्की से चलकर हिंदुस्तान आया था, लूट-मार करने. 1336 में तैमूर जन्मा था बारअक्स में. उज्बेकिस्तान. तुर्की एरिया था ये. बाप ने इस्लाम कबूल किया था. तैमूर के पास सोचने का वक्त नहीं था. इस्लाम के नाम पर आगे बढ़ने की तमन्ना थी. क्योंकि कुछ और करने की गुंजाइश नहीं थी. उस वक्त सिकंदर औऱ चंगेज खान की कहानियां ही चलती थीं. समस्त संसार को अपने पैरों के नीचे रखना ख्वाहिश होती थी. नाम सुनते ही लोगों की भाग-दौड़ देखने का आनंद होता था. तब कवि यही लिखा करते थे कि जिधर को बादशाह निकला, तारे झुक गये, चांद छुप गया, हवा बहने लगी. ऐसा होता कुछ नहीं था, माहौल बना दिया जाता था. तलवार गर्दन पर रहे, तो उटपटांग ही लिख पाएगा इंसान.

1369 में तैमूर समरकंद का बादशाह बन गया. वही समरकंद जहां से बाबर आया था. खुद को तैमूर का वंशज बताता था. तो चंगेज खान की तर्ज पर तैमूर ने भी लड़ाई से ज्यादा विनाश शुरू किया. मारता कम घसीटता ज्यादा वाला जुमला शायद इन्हीं लोगों से आया था. इनकी पॉलिसी को बाद में स्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी कहा गया. मतलब इतना विनाश कर दो कि शत्रु फिर उठने ना पाये. 1393 तक पूरे मेसोपोटामिया यानी इराक तक तैमूर का अधिकार हो गया.

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उज्बेकिस्तान में तैमूर की मूर्ति

उस वक्त भारत का नाम दुनिया में सम्मान से लिया जाता था. धनी देश हुआ करता था भारत. तैमूर के मन में आया कि चल के देखते हैं. कहानी तो बहुत पढ़े हैं. हार भी जायेंगे तो क्या हुआ. देख तो लेंगे ही. पर पता चला कि जीतने की संभावना ज्यादा है. क्योंकि उस वक्त तुगलक वंश चल रहा था यहां. अक्षम शासक थे. 1398 में तैमूर ने काम शुरू किया. मुल्तान को जीता. औऱ फिर भारत पर फुल फ्लेज्ड हमला कर दिया. 13 अक्टूबर 1398 को तैमूर सिंधु, रावी और झेलम को पार कर भारत में दाखिल हुआ. तुलुंबा नगर पर हमला कर लूट-पाट मचा दी.पहुंचकर दिल्ली में 5 दिन लोगों को काटता रहा. उसके बाद भटनेर और पानीपत होते हुए दिल्ली पहुंचा. पानीपत नाम ही इसलिए पड़ा था कि पानी से पटा हुआ था एरिया. खाना-पीना भरपूर था यहां. लड़ाई होती थी तो मजा आता था. क्योंकि रसद कम नहीं पड़ती थी. सुल्तान महमूद गुजरात भाग गया. दूसरे दिन तैमूर दिल्ली में दाखिल हुआ. 5 दिन तक शहर में कत्ल-ए-आम हुआ. लोगों को काट दिया गया. सड़कों पर. दिल्ली में खून बह रहा था. इसके बाद तैमूर 15 दिन तक यहां की संपत्ति लादता रहा. कारीगरों को बंदी बनाकर ले जाता रहा. इन्हीं कारीगरों से उसने अपने यहां जामा मस्जिद बनवाई थी.

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लड़ाई की पेंटिंग

उसे राज तो करना नहीं था. वो मेरठ गया. लूटा. हरिद्वार तक पहुंचा. लूटा. जम्मू तक पहुंचा. लूटा. थक गया. मार्च 1399 में वापस लौट गया. वापस लौट कर उसने महान ऑटोमन साम्राज्य के शासक को हराया. उसके बाद चीन पर भी हमला करने का प्लान था इसका. पर 1405 में इसकी मौत हो गई. पूरी जिंदगी वो चंगेज खान की लीगेसी बरकरार रखने की बात कर रहा था. तो इसी वजह से उसके बारे में कहानियां बहुत चलती हैं. कहते हैं कि तैमूर लोगों को मार के नरमुंड के ढेर लगाकर हंसता था. लड़ाई के बाद उसका फेवरिट पास्टाइम था ये. दिल्ली में तो नरमुंड का स्तूप बनवा दिया था.

सर्वखाप पंचायती सेना

तैमूर लंग ने मार्च सन् 1398 ई० में भारत पर 92000 घुड़सवारों की सेना से तूफानी आक्रमण कर दिया। तैमूर के सार्वजनिक कत्लेआम, लूट खसोट और सर्वनाशी अत्याचारों की सूचना मिलने पर संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) कार्तिक बदी 5 को देवपाल राजा (जिसका जन्म निरपड़ा गांव जि० मेरठ में एक जाट घराने में हुआ था) की अध्यक्षता में हरयाणा सर्वखाप पंचायत का अधिवेशन जि० मेरठ के गाँव टीकरी, निरपड़ा, दोगट और दाहा के मध्य जंगलों में हुआ।

सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये –

(1) सब गांवों को खाली कर दो।

(2) बूढे पुरुष-स्त्रियों तथा बालकों को सुरक्षित स्थान पर रखो।

(3) प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति सर्वखाप पंचायत की सेना में भर्ती हो जाये।

(4) युवतियाँ भी पुरुषों की भांति शस्त्र उठायें।

(5) दिल्ली से हरद्वार की ओर बढ़ती हुई तैमूर की सेना का छापामार युद्ध शैली से मुकाबला किया जाये तथा उनके पानी में विष मिला दो।

(6) 500 घुड़सवार युवक तैमूर की सेना की गतिविधियों को देखें और पता लगाकर पंचायती सेना को सूचना देते रहें।

पंचायती सेना – पंचायती झण्डे के नीचे 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये। इन वीरांगनाओं ने युद्ध के अतिरिक्त खाद्य सामग्री का प्रबन्ध भी सम्भाला। दिल्ली के सौ-सौ कोस चारों ओर के क्षेत्र के वीर योद्धा देश रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने रणभूमि में आ गये। सारे क्षेत्र में युवा तथा युवतियां सशस्त्र हो गये। इस सेना को एकत्र करने में धर्मपालदेव जाट योद्धा जिसकी आयु 95 वर्ष की थी, ने बड़ा सहयोग दिया था। उसने घोड़े पर चढ़कर दिन रात दूर-दूर तक जाकर नर-नारियों को उत्साहित करके इस सेना को एकत्र किया। उसने तथा उसके भाई करणपाल ने इस सेना के लिए अन्न, धन तथा वस्त्र आदि का प्रबन्ध किया।

प्रधान सेनापति, उप-प्रधान सेनापति तथा सेनापतियों की नियुक्ति

सर्वखाप पंचायत के इस अधिवेशन में सर्वसम्मति से वीर योद्धा जोगराजसिंह गुर्जर को प्रधान सेनापति बनाया गया। यह खूबड़ परमार वंश का योद्धा था जो हरद्वार के पास एक गाँव कुंजा सुन्हटी का निवासी था। बाद में यह गाँव मुगलों ने उजाड़ दिया था। वीर जोगराजसिंह के वंशज उस गांव से भागकर लंढोरा (जिला सहारनपुर) में आकर आबाद हो गये जिन्होंने लंढोरा गुर्जर राज्य की स्थापना की। जोगराजसिंह बालब्रह्मचारी एवं विख्यात पहलवान था। उसका कद 7 फुट 9 इंच और वजन 8 मन था। उसकी दैनिक खुराक चार सेर अन्न, 5 सेर सब्जी-फल, एक सेर गऊ का घी और 20 सेर गऊ का दूध।

महिलाएं वीरांगनाओं की सेनापति चुनी गईं उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) रामप्यारी गुर्जर युवति (2) हरदेई जाट युवति (3) देवीकौर राजपूत युवति (4) चन्द्रो ब्राह्मण युवति (5) रामदेई त्यागी युवति। इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।

उपप्रधान सेनापति(1) धूला भंगी (बालमीकी) (2) हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी जि० हिसार के हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी (बड़ा महान् डाकू) था जिसका वजन 53 धड़ी था। उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि – “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से

पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये।

दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था जिसका गोत्र गुलिया था। यह हरयाणा के जि० रोहतक गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था।

सेनापतियों का निर्वाचन – उनके नाम इस प्रकार हैं – (1) गजेसिंह जाट गठवाला (2) तुहीराम राजपूत (3) मेदा रवा (4) सरजू ब्राह्मण (5) उमरा तगा (त्यागी) (6) दुर्जनपाल अहीर।

जो उपसेनापति चुने गये – (1) कुन्दन जाट (2) धारी गडरिया जो धाड़ी था (3) भौन्दू सैनी (4) हुल्ला नाई (5) भाना जुलाहा (हरिजन) (6) अमनसिंह पुंडीर राजपुत्र (7) नत्थू पार्डर राजपुत्र (8) दुल्ला (धाड़ी) जाट जो हिसार, दादरी से मुलतान तक धाड़े मारता था। (9) मामचन्द गुर्जर (10) फलवा कहार।

सहायक सेनापति – भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये।

वीर कवि – प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था।

मेरठ युद्ध – तैमूर ने अपनी बड़ी संख्यक एवं शक्तिशाली सेना, जिसके पास आधुनिक शस्त्र थे, के साथ दिल्ली से मेरठ की ओर कूच किया। इस क्षेत्र में तैमूरी सेना को पंचायती सेना ने दम नहीं लेने दिया। दिन भर युद्ध होते रहते थे। रात्रि को जहां तैमूरी सेना ठहरती थी वहीं पर पंचायती सेना धावा बोलकर उनको उखाड़ देती थी। वीर देवियां अपने सैनिकों को खाद्य सामग्री एवं युद्ध सामग्री बड़े उत्साह से स्थान-स्थान पर पहुंचाती थीं। शत्रु की रसद को ये वीरांगनाएं छापा मारकर लूटतीं थीं। आपसी मिलाप रखवाने तथा सूचना पहुंचाने के लिए 500 घुड़सवार अपने कर्त्तव्य का पालन करते थे। रसद न पहुंचने से तैमूरी सेना भूखी मरने लगी। उसके मार्ग में जो गांव आता उसी को नष्ट करती जाती थी। तंग आकर तैमूर हरद्वार की ओर बढ़ा।

हरद्वार युद्ध – मेरठ से आगे मुजफ्फरनगर तथा सहारनपुर तक पंचायती सेनाओं ने तैमूरी सेना से भयंकर युद्ध किए तथा इस क्षेत्र में तैमूरी सेना के पांव न जमने दिये। प्रधान एवं उपप्रधान और प्रत्येक सेनापति अपनी सेना का सुचारू रूप से संचालन करते रहे। हरद्वार से 5 कोस दक्षिण में तुगलुकपुर-पथरीगढ़ में तैमूरी सेना पहुंच गई। इस क्षेत्र में पंचायती सेना ने तैमूरी सेना के साथ तीन घमासान युद्ध किए।

उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों* तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। (तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया)। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा। उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीरसिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। जोगराजसिंह को इस योद्धा की वीरगति से बड़ा धक्का लगा। हरद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगति को प्राप्त हो गये। वहां पर 2000 से ऊपर पहाड़ी तीरन्दाज पंचायती सेना में मिल गये थे। एक तीर तैमूर के हाथ में लगा था। तीसरे युद्ध में प्रधान सेनापति जोगराजसिंह ने अपने वीर योद्धाओं के साथ तैमूरी सेना पर भयंकर धावा करके उसे अम्बाला की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में वीर योद्धा जोगराजसिंह को 45 घाव आये परन्तु वह वीर होश में रहा। पंचायती सेना के वीर सैनिकों ने तैमूर एवं उसके सैनिकों को हरद्वार के पवित्र गंगा घाट (हर की पौड़ी) तक नहीं जाने दिया। तैमूर हरद्वार से पहाड़ी क्षेत्र के रास्ते अम्बाला की ओर भागा। उस भागती हुई तैमूरी सेना का पंचायती वीर सैनिकों ने अम्बाला तक पीछा करके उसे अपने देश हरयाणा से बाहर खदेड़ दिया।

वीर सेनापति दुर्जनपाल अहीर मेरठ युद्ध में अपने 200 वीर सैनिकों के साथ दिल्ली दरवाज़े के निकट स्वर्ग लोक को प्राप्त हुये।

इन युद्धों में बीच-बीच में घायल होने एवं मरने वाले सेनापति बदलते रहे थे। कच्छवाहे गोत्र के एक वीर राजपूत ने उपप्रधान सेनापति का पद सम्भाला था। तंवर गोत्र के एक जाट योद्धा ने प्रधान सेनापति के पद को सम्भाला था। एक रवा तथा सैनी वीर ने सेनापति पद सम्भाले थे। इस युद्ध में केवल 5 सेनापति बचे थे तथा अन्य सब देशरक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुये। हमारी पंचायती सेना के 35,000वीर एवं वीरांगनाएं देश के लिये वीरगति को प्राप्त हुए थे।

वीर योद्धा प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर युद्ध के पश्चात् ऋषिकेश के जंगल में स्वर्गवासी हुये थे।

वैसे कोई इन महापुरुषों से पूछे कि क्या चार लाख बंगालियों को मारने वाले वीर मराठे सही थे? या सुर असुर संग्राम के सहारे कथित असुर(गैर आर्य) को मारने वाले सुर सही थे; या लाखों को मौत के घाट उतार कर बौद्ध धर्म अपनाने वाले अशोक सही थे? खैर तैमूर जैसे आक्रान्ताओं से मुझे नफरत है. मुझे आज ही पता लगा है कि क्योंकि मेरा नाम रविन्द्र है अतः मैं अब सूर्य बन गया हूँ. इस लेख को पढ़ कर इतिहास को जानें और उसके बाद सोचें कि क्या हम सरकार को मुद्दे ख़त्म करने की इजाजत ऐसे दे देंगे? तैमूर, ओवैसी जैसे लोग भाजपा के दोस्त हैं जो इसे किसी न किसी रूप में जिन्दा रखते हैं; वरना भाजपा के पास मुद्दों पर करने के लिए कभी कुछ होता ही नहीं.

Reference: Nidana Heights , Lallantop