तुम्हारे धर्म की क्षय हो

पिछले दो दिनों में दो ऐसी खबरें आईं जिन्होंने अंतर्मन को झझकोर कर रख दिया है. एक तरफ कश्मीर में दरिंदों की भीड़ ने मोहम्मद अयूब पंडित नामक एक जांबाज DSP को पीट पीट कर मार दिया; तो दूसरी तरफ हरियाणा के बल्लभगढ़ के रहने वाले एक 17 वर्षीय युवा मुस्लिम को भीड़ ने पीट पीट कर मार दिया. थोडा आगे बढने से पहले जरा घटनाओं का जायजा लेते हैं.

जम्मू एवं कश्मीर:

रिपोर्ट के अनुसार पंडित साहब मस्जिद में सुरक्षा ड्यूटी पर थे जब उन पर बिना किसी बात के लगभग 200 लोगों की भीड़ ने हमला कर दिया और तब तक पीटते रहे जब तक उन्होंने दम नहीं तोड़ दिया. परिवार कहता है; न वे इन्फोर्मर थे और न गद्दार; तो क्यों मारा गया.

पलवल (हरयाणा):

रिपोर्ट के अनुसार तीन मुस्लिम युवा ईद की खरीददारी कर रेल से अपने घर बल्लभगढ़ जा रहे थे. इतने में कुछ असामाजिक तत्वों ने पहले उनसे सीट मांगी; फिर उनके न उठने पर उन्हें देशद्रोही, मांसभक्षी आदि शब्दों से सम्बोधित करना प्रारंभ कर दिया. प्रतिवाद करने पर उन्हें बुरी तरह पीटा गया और बाद में रेल से बाहर फैंक दिया गया. इस घटनाक्रम में एक युवा की मृत्यू हो गयी तो बाकी दो गम्भीर अवस्था में फ़िलहाल हस्पताल में दाखिल हैं. ज्ञातव्य है कि उन्होंने टोपी पहनी हुई थी. पहले उनकी टोपी उतारी गयी, फिर मुल्ला जैसे शब्दों से सम्बोधित किया गया.

ये दोनों लगभग एक जैसे दिखने वाले मामले भारत में बढ़ता हुआ भीड़तन्त्र का इन्साफ है जिसने कानून व्यवस्था, कानून के राज पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है. अभी कुछ ही दिन पहले हिन्दू युवा वाहिनी के गुंडों ने उत्तरप्रदेश में एक मुस्लिम को पीट पीट कर मार दिया था; उससे दो माह पहले अलवर में मेवात के एक बुजुर्ग पहलू खान को पीट पीट कर मारा गया था.

अल्लामा इकबाल ने अपने महान गीत में कहा है:

“मजहब नहीं सिखाता, आपस में वैर रखना,

हिंदी हैं हम वतन हैं, हिन्दुस्तान हमारा.”

क्या था इनका कसूर?

यदि चारों मामलों को ध्यान से देखा जाये तो इनमें एक ही बात कॉमन मिलेगी वह यह है कि चारों मरने वाले मुस्लिम थे, जम्मू कश्मीर के मामले को छोड़ बाकी तीनो में मारने वाले हिन्दू थे और इन सब को धर्म की वजह से मारा गया. ऐसा लगता है कि अब इकबाल का गीत बदल चुका है. अब नया गीत बनना चाहिए वह है,

“मजहब ही सिखाता है, आपस में वैर रखना,

न हिंदी हैं हम, न वतन हैं, न हिन्दुस्तान हमारा”.

अब प्रश्न यह उठता है कि यदि धर्म मारने का कारण था तो कश्मीर में पंडित साहब को क्यों मारा गया. कुछ लोगों का कहना है कि उनके नाम में पंडित शब्द था और नाम में हिन्दू शब्द होने के कारण शायद हिन्दू सोच मार दिया गया. ऐसे में यह अपराध भी नफरत के अपराध यानी हेट क्राइम की श्रेणी में आता है. कहा जाता है कि आस्था अफीम की तरह होती है. किसी को केवल इस कारण मार देना कि वह फलां धर्म को मानने वाला है; यह एक बहुत बड़े पागलपन की तरफ इस देश को बढ़ते हुए दिखा रहा है. धार्मिक संवेदनाएं जिन्हें मैं सबसे बड़ा झूठ मानता हूँ; वे अपने उच्चतम स्तर पर हैं. हिन्दू और मुस्लिम दोनों को अपना अपना धर्म खतरे में लग रहा है. दोनों कथित तौर पर उसे बचाने पर उतारू हैं. ऐसे में देश कहाँ गया? कहाँ गया हमारा वह भारत जहाँ हजारों मत, हजारों बोलियाँ, हजारों भाषाएँ और दसियों धर्म एक साथ सदियों से रहते आये हैं. धर्म के नाम पर मार रहे इन दरिंदो को देश कहाँ दिख रहा है? क्या वे देश को सीमाओं में बंधा कोई जमीन का टुकडा मानते हैं? देश कोई जमीन का टुकड़ा नहीं; देश यहाँ के नागरिकों और बाशिंदों से बनता है. ऐसे में यहाँ के बाशिंदों को धर्म के नाम पर मारने वाले न केवल हत्यारे हैं, अपितु इस देश की आत्मा को मारने का प्रयास करने वाले देशद्रोही हैं. कश्मीर में हिन्दू को मारने वाले मुस्लिम, अन्य भारत में मुस्लिम को मारने वाले हिन्दू एक जैसे हैं; देशद्रोही; इस देश की आत्मा को मारने वाले. मरने वालों का कसूर केवल इतना था कि वे “वे” थे और उन्हें देशद्रोह का सर्टिफिकेट मिल चुका है. ऐसा सर्टिफिकेट जिसकी न अपील है और न ही कोई यू टर्न. मारने वाले धर्मांध गुंडे जो इस देश में रह जरूर रहे हैं लेकिन इस देश के बाशिंदे नहीं. इस देश के बाशिंदे तो वे हैं जो न हिन्दू हैं, न मुसलमान हैं; वे केवल इंसान हैं. अखंड भारत का दिवास्वप्न दिखा देश को धर्म के नाम पर बाँट रहे संगठन भी इस देश के नहीं. वे भी देशद्रोही हैं. अखंड हिन्दू राज्य लगभग सौ करोड़ मुस्लिमो की लाशों पर बन सकता है; अन्यथा इसके बनने की कोई सम्भावना नहीं. ऐसे में इस स्वप्न को मन में पाले लोगों को धर्मांध बना रहे संगठन किस प्रकार देश के जनमानुष में जहर भर रहे हैं वह देखा और समझा जा सकता है. धर्म को छोड़ दो; मेरे लिए धर्म गौण स्थिति है. इस देश के मुस्लिम कम से कम इतने तो देशभक्त हैं ही कि बंटवारे के समय उन्होंने पकिस्तान नहीं; भारत को चुना था. ऐसे में उनकी देशभक्ति, आस्था को लगातार छेड इस देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा की जा रही है; एक ऐसी गृहयुद्ध की स्थिति जो लाखों लाशें बिछने के बाद; भारत की आत्मा के मरने के बाद ही ठीक हो सकती है; अन्यथा नहीं. मजहबी जज्बात एक ऐसे जहर की तरह है जो इंसान को परमानेंट अंधा बना देता है; ऐसे लोग कभी देश के नहीं हो सकते; ऐसे लोग कभी इंसान नहीं हो सकते. जब तक धर्म खतरे में रहेगा; इंसानियत ऐसे ही मरती रहेगी. राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में धर्म को समझते हैं, वे कहते हैं: “धर्म अथवा मजहब का असली रूप क्या है? मनुष्य जाति के शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या विश्वासों का समूह ही धर्म है। यदि उसमें और भी कुछ है तो वह है पुरोहितों, सत्ता धारियों और शोषक वर्गों के धोखे फरेब, जिससे वे अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से बाहर नहीं जाने देना चाहते.” वर्ग तुष्टिकरण, अर्थात किसी वर्ग विशेष के तुष्टिकरण के लिए किये जाने वाले ये अपराध बर्दाश्त से बाहर हैं. समस्त पृथ्वी पर मुस्लिम साम्राज्य को लागू करने के लिए आतंकवाद फैला रहे मुस्लिम और अखंड हिन्दू साम्राज्य के नाम पर गुंडाई फैला रहे और गैर हिन्दुओं को जान से मार रहे हिन्दू दोनों ही इस पृथ्वी पर अनावश्यक हैं और दोनों को ही इस दुनिया से समाप्त हो जाना चाहियें. इसके साथ ही वे सब लोग समाप्त होने चाहियें जो घटनाक्रम को pick and choose policy के तहत अपनी सुविधानुसार उठाते हैं और उनकी व्याख्या करते हैं. कश्मीर की घटना पर कोहराम मचाने वाले और पलवल की घटना पर चुप्पी साधे लोग उतने ही गद्दार हैं जितने वे कश्मीरी गद्दार हैं जो धर्म के नाम पर भारत से अलग होना चाहते हैं. इस देश में ये दोनों लोग अनावश्यक हैं. पिछले वर्ष दिल्ली के एक डाक्टर श्री नारंग की खुले आम हत्या कर दी गयी थी. उनकी हत्या करने वाले मुस्लिम धर्म के लोग थे. समूची दुनिया के लगभग हर बड़े देश में जिहाद के नाम पर आतंक मचा रहे आतंकवादी भी मुस्लिम धर्म से सम्बन्ध रखते हैं. धर्म के नाम पर हत्याओं का सिलसिला लगातार जारी है. एक डाटाबेस के अनुसार समूचे विश्व में धर्म के नाम पर हो रही हत्याएं किसी भी अन्य कारण से हो रही हत्याओं से कहीं अधिक हैं. ऐसे में धर्म/मजहब को आज के दिन सबसे बड़ा हत्यारा कहना सही होगा. मुझे उन हिन्दुओं से घृणा आती है जो धर्म के नाम पर सीधे यह प्रश्न चिह्न उठाते हैं कि यदि मैं मुस्लिम की धर्म के नाम पर हत्या का प्रश्न उठाता हूँ तो मैं मुस्लिम समर्थक हूँ. ऐसे में कथित सेक्युलरवाद के नाम पर घेरने की कोशिश की जाती है. मेरे लिए हिन्दू धर्म भी घृणा का पात्र है और मुस्लिम धर्म इससे भी बड़ी घृणा का पात्र है जहाँ लोग नफरत के नये आयाम रच रहे हैं. उन्हें इंजमाम उल हक़ जैसे खिलाड़ियों को सुनना चाहिए जो कहते हैं कि मजहब भी सही है, इसकी किताबें भी सही हैं, लेकिन ऐसे मुसलमान रहे कहाँ? आज ही एक प्रश्न का सामना करना पडा कि यदि भारत में रह जाने वाले मुस्लिम देशभक्त हैं तो पाकिस्तान से भारत में आये हिन्दू देशभक्त नहीं हैं क्या? मुझे इस मानसिकता पर तरस आता है; क्योंकि मैंने किसी हिन्दू को तो अथवा किसी समुदाय को तो देशद्रोही घोषित कर सर्टिफिकेट दिया ही नहीं;ऐसे में मैं उन हिन्दुओं की निष्ठा पर संदेह उठाने वाला कौन? कश्मीर में पंडितों को मार भगाने वाले मुस्लिम भी बुरे हैं और मध्यप्रदेश में ISI को अपना ईमान बेचने वाले हिन्दू भी. इसाइयत का प्रचार कर रहे और प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करवाने वाले पादरी भी बुरे हैं और उन्हें मारने वाले हिन्दू भी. अपराधी तो अपराधी है; उसका क्या धर्म और क्या मजहब. वे केवल नफरत के लायक होते हैं; ऐसे में इन अपराधियों का समर्थन कैसे? मैं तीन तलाक के नाम पर मुस्लिम महिलाओं से अत्याचार कर रहे मुस्लिमों से भी नफरत करता हूँ और दहेज, पर्दा, घूँघट, ऑनर किलिंग कर रहे हिन्दुओं से भी. ऐसे में कम से कम मुझे किसी पाले में रखने वाला अपने मानसिक स्तर की जांच कर ले तो बेहतर है. आदम गोंडवी साहब ने इस देश के सियासतदानों को एक संदेश दिया था:

हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए

अपनी कुरसी के लिए जज्‍बात को मत छेड़िए

इस संदेश के साथ ही दोनों मृतक आत्माओं को श्रद्दांजलि. और धर्म बचाने निकले धर्म रक्षको; तुम्हारे धर्म की क्षय हो! राहुल सांकृत्यायन के शब्दों के साथ लेख को समाप्त करता हूँ,“मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को है सिखाता भाई का खून पीना। हिन्दुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसका, मौत को छोड़कर इलाज नहीं।“