या तो काला धन है नहीं या विमुद्रीकरण फेल!

Rs 500 Notes

विमुद्रीकरण के बाद जैसे जैसे दिन बढ़ रहे हैं वैसे वैसे अजीब प्रकार के डेटा सामने आ रहे हैं. 28 नवम्बर को जारी हुआ डेटा अपने आप में बहुत कुछ ब्यान कर रहा है. सबसे पहले उस डेटा को देखें:

आरबीआई के अनुसार 27 नवम्बर की रात तक कुल ₹ 8,44,982 crore रूपये बैंक में आये जिसमें से ₹ 33,948 crore काउंटर पर एक्सचेंज करवाए गये और बाकि के ₹ 8,11,033 crore बैंक में जमा करवाए गये हैं. इसके अलावा ₹ 2,16,617 crore काउंटर और एटीएम से निकलवाये गये हैं.

फिर समस्या क्या है?

समस्या यह है कि सरकार के अनुसार भारत में लगभग ₹15.5 लाख करोड़ की मुद्रा 500 और 1000 की डिनोमिनेशन में प्रचलन में थी. जिसमें से 27 नवम्बर तक साढ़े आठ लाख करोड़ रूपये अब तक बैंक में आ चुके हैं. ज्ञातव्य है कि सभी बैंकों को एक बड़ा अमाउंट कैश रिजर्व रेश्यो के रूप में आरबीआई के पास रखना होता है. यह पैसा सेक्यूरिटी के रूप में रखा जाता है ताकि लोन डिफॉल्ट के बाद भी जनता का पैसा बैंक में सुरक्षित रह पाए. 8 नवम्बर 2016 को आरबीआई के पास ₹ 4,06,900 crore CRR के रूप में जमा थे यानी कुल लगभग 10 लाख करोड़ से कुछ ज्यादा की मुद्रा सर्कुलेशन में थी. इसमें से बैंक में ₹ 8,44,982 crore आ गये हैं तो अब बचे क्या? आधिकारिक डेटा के अनुसार भारत में लगभग 3 से 5 लाख करोड़ का काला धन होना चाहिए था. वो पैसा गया कहाँ? या तो पैसा सफेद हो चुका है या भारत सरकार जानती ही नहीं कि भारत में कितना काला धन है. अब इसमें एक और डेटा को शामिल करते हैं. बैंक्स में एक बड़ी मात्रा में कैश नित्य कार्यों के लिए रखा जाता है. 8 नवम्बर को सभी बैंक्स के पास लगभग 70,000 करोड़ रूपये कैश डिपोजिट और 50,000 करोड़ रूपये कैश इन हैण्ड के रूप में मौजूद थे. यानि ₹15.5 लाख करोड़ में से ₹13 लाख करोड़ तो 27 नवम्बर तक सफेद हो चुका; एक माह पूरा पडा था. विमुद्रीकरण फेल! या फिर सरकार को यही नहीं पता कि कितनी करेंसी सर्कुलेशन में है.

आज की स्थिति?

लगभग बीस से अधिक बार आरबीआई रूल बदल चुका है. हर रोज नई बात सामने आती है. एक दिसम्बर को तनख्वाह वाले दिन सारे भारत में जो दिक्कतें देखने को मिलीं वो अलग! न लाइनें टूट रही हैं और न ही न ही लोगों की समस्याएँ ही कम हो रही हैं. ऊपर से सोने पर जो फरमान आया है उसका मतलब क्या है यह जनता को नहीं समझ आ रहा. सरकार उतना ही कन्फ्यूज है जितना कि आम आदमी!

कमेरा अर्थशास्त्री

रविन्द्र